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Kishor Shukla

Inspirational

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Kishor Shukla

Inspirational

जीवन

जीवन

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कभी चन्दन, कभी क्रंदन,

कभी हो आत्म-अभिनन्दन।

कभी दुर्भेद्य अंतर्मन

कभी पावन कभी वंदन।


कभी हर तत्त्व से ही दूर,

फिरता है मेरा ये मन,

कभी ताके है शून्य में

नयन में घोल ले गगन।


कभी दुःख-वास्तविकता हो,

कभी हो कल्पना का क्षण,

कभी प्रातः की किरणों से,

चमकता है हृदय आँगन।


कभी धरती-सा हो जाता,

सहन-शक्ति समाता तन,

कभी उपहास रत्ती भर,

नहीं सहता ये अंतर्मन।


कभी बजता बिगुल ऐसा,

कि फिर आरम्भ होता रण,

रहे जो ज्ञात नश्वरता,

तो क्यों अमरत्व ढूँढता मन।


कभी निज-भाव के आगे,

त्याग देता समूचा धन,

कभी अभिभूत धन से हो,

करे निज-भाव का हनन।


कहीं व्यापक है आलिंगन,

कहीं तड़पन कहीं चुंबन,

कहीं है प्रेम-व्यापकता,

बसे कण-कण बसे जन-जन।


कभी फिरता है सीना तान,

करके वृक्ष का रोपण,

कभी ले हाथ कुल्हाड़ी,

दनादन काट देता वन।


कभी कहता कि प्रेम से बड़ा,

दिखता नहीं धर्म,

कभी इस्लाम को कोसे,

सनातन में दिखे भ्रम।


कभी हो वार कभी निसार,

कभी खंजर कभी कंगन

कभी टकरा भी जाता है,

तेरा जीवन मेरा जीवन।


यही एक सार जीवन का,

कि जब तक साँस लेता तन,

करो हर द्वेष का अर्पण,

करो हर घाव का अर्पण।


"हाँ, माना रुक गई हो श्वास,

डोलता नहीं अब तन,

कि इससे भी बहुत आगे,

तेरा जीवन मेरा जीवन।।"


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