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Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational Children

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Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational Children

गुस्सा हो क्या?

गुस्सा हो क्या?

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गौरैया

तुम कहां हो

अब तुम

आती नहीं

गुस्सा हो क्या

कल तक

तुम सब

झुंडों में

मुंडेर पर

आती थी

खूब

चहचहाती थी

अपनी

चहचहाहट से

चहुँ ओर

वातावरण में

रस घोलती थी

फिर आंगन में

उतर आती थी

आंगन में बिखरे

दाने को

अपना निवाला

बनाती थी

आंगन में ही

रखे सकोरे में

पानी भी पीती थी

पंख भीगो भिगोकर

खूब नहाती थी

फिर फुर्र से

तुम सब उड़ जाती थी

अब तुम सब कभी भी

आती नहीं

आंगन का दाना खाती नहीं

यूं ही पड़े रह जाते हैं दाने

तुम सब कहां चले गए

गुस्सा हो क्या 

हमें बता देना 

हम तुम्हें मनाएंगे। 


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