STORYMIRROR

Parag Kulshrestha

Abstract

4  

Parag Kulshrestha

Abstract

बीत गए वो दिन

बीत गए वो दिन

1 min
255

            बीत गए वो दिन,

जब हम बिना कुछ सोचे समझे,

कुछ भी बोल दिया करते थे,

जब हम अपना खिलौना का पिटारा,

कहीं भी खोल दिया करते थे।


बीत गए वो दिन,

जब गरमी की छुट्टियों में ,

नानी के यहां जाया करते थे,

जो मन करता था ,

वो ज़िद्द करके खाया करते थे।


बीत गए वो दिन,

जब ना आगे क्या करना है,

या पहले क्या किया था,

इसके बारे में ना सोचकर ,

वर्तमान में जीया करते थे।


बीत गए वो दिन,

जब हम भी बच्चे 

हुआ करते थे,

जब हम भी मन के

सच्चे हुआ करते थे।

बीत गए ............


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Parag Kulshrestha

Similar hindi poem from Abstract