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Parag Kulshrestha

Abstract

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Parag Kulshrestha

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बीत गए वो दिन

बीत गए वो दिन

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            बीत गए वो दिन,

जब हम बिना कुछ सोचे समझे,

कुछ भी बोल दिया करते थे,

जब हम अपना खिलौना का पिटारा,

कहीं भी खोल दिया करते थे।


बीत गए वो दिन,

जब गरमी की छुट्टियों में ,

नानी के यहां जाया करते थे,

जो मन करता था ,

वो ज़िद्द करके खाया करते थे।


बीत गए वो दिन,

जब ना आगे क्या करना है,

या पहले क्या किया था,

इसके बारे में ना सोचकर ,

वर्तमान में जीया करते थे।


बीत गए वो दिन,

जब हम भी बच्चे 

हुआ करते थे,

जब हम भी मन के

सच्चे हुआ करते थे।

बीत गए ............


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