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SHIVESH SHANDILYA

Abstract

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SHIVESH SHANDILYA

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बहुत खंगाला खुद को

बहुत खंगाला खुद को

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बहुत खंगाला खुद को

तो कई परत धूल के नीचे दबी

कुछ सिसकियाँ निकली

कुछ आह कुछ कराहें निकली

कुछ दर्द ऐसी निकली

जिसे कुछ रोज से भूल चुका था मैं

कुछ यादें ऐसी निकली

जिसे बंद कर चूका था मैं

किसी कोने में,

किसी पुराने संदूक में

जो मिली थी मुझे अपने

पुराने खजाने में।।


जब और नीचे झाँका तो

बहुत कुछ निकला

कुछ डबडबाई आँख,

कुछ अनकहे अल्फाज़ निकले

कुछ रेशमी कपड़े,

कुछ सिल्क की साड़ियाँ निकली

और निकले कुछ सवा दो

साइज की चूड़ियाँ

हरे लाल नारंगी रंगों के

अलग अलग साड़ियों के साथ

मैच करती चूड़ियाँ

जो रखे थे कभी मौके

दर मौके पहनने के लिए

जो मौके आये नहीं थे,

अभी आने वाले थे।।


कुछ किताबें निकली,

कुछ कविताओं के पन्ने,

कुछ नज़ाकत से रखे

आईने भी निकले,

पता नहीं आज तक

वो क्यूँ नहीं निकले ?

कुछ दीमक लगे लिफ़ाफ़े,

और उनमें तह किये

कुछ सपने निकले,

कुछ मेरे थे कुछ उसके थे,

पर सब के सब अपने ही थे।।


और निकाला गया न मुझसे,

कुछ और खंगाला गया न मुझसे,

आँखों में बस पानी ही थे,

होठों पर फिर भी मुस्कान तो थे

कुछ और कभी और निकालूंगा

जब फिर से, कई दिनों बाद,

धूल की परत हटाने को जी चाहेगा।।


बहुत खंगाला खुद को,

तो कई परत धूल के नीचे

दबी कुछ यादें निकली

कुछ सिसकियाँ निकली,

कुछ डबडबाई आँख ,

कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ निकले।।


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