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Shabnam Malik

Abstract Drama

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Shabnam Malik

Abstract Drama

बेमतलब सी मोहब्बत मेरी

बेमतलब सी मोहब्बत मेरी

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उसके साथ होने से,

रातें सुकून भरी,

और वो धूप भी सुनहरी थी।

उसकी मतलबी सी दुनिया में,

बेमतलब सी मोहब्बत मेरी थी।


मालूम नहीं मुझे आज तक,

उसका इश्क़ था या छलावा,

छूटा वो कुछ रेत की तरह सा हाथों से,

आंखों में नींद भी ना ठहरी थी।

उसकी मतलबी सी दुनिया में,

बेमतलब सी मोहब्बत मेरी थी।


शिकवा भी क्या करू उससे,

शायद गलती उसकी नहीं,

उम्मीदें मेरी ही गहरी थी।

उसकी मतलबी सी दुनिया में,

बेमतलब सी मोहब्बत मेरी थी।


और फिर साथ रहते भी कैसे,

हमें अलग करने में,

साजिश वक्त की भी तो पूरी थी।

उसकी मतलबी सी दुनिया में,

बेमतलब सी मोहब्बत मेरी थी।


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