STORYMIRROR

Maitreyee Chauhan

Abstract

4  

Maitreyee Chauhan

Abstract

अकेलापन

अकेलापन

1 min
425

हर शख़्स अकेला है यहाँ

हर शख़्स में एक राज़ है


दरवाजे खुले तो देखूँ

किसमें कितना इंसान है


लिपटे पड़े हैं अपने मज़बूर-ए-हालात से

ख़ैर खबर नहीं, बस निकले हैं अँधेरों की तलाश में


पाकर भी सब रख दिया है एक कोने में

ये तन्हाई कैसी है इन रफ़्तारी इंसानो में


मशरूफ़ीयत से बांध लिया है खुद को इन्होंने

सुकून के पल बस दो चार बाकी है


कहने को सब एक दूसरे के साथी है

देखो मगर हर शख़्स कितना एकाकी है


ख़ुशनुमा लम्हों में है शरीक

बुरे दौर में फकत तन्हाई साथ पायी है


हस्ते हुए चेहरे दिखते हैं बहुत

जो जितना हँसे उसके आंसु उतने भारी है


वाबस्ता भी तो नहीं किसी एक से

हर रोज किसी अजनबी से दोस्ती निभानी है


आज़ादी से अकेलेपन तक का सफ़र है ये

किसी एक का होने मे बंदिश नहीं, सुकून-ऐ-दीवानगी है


ख़त्म कर दे कोई ख़ुद को अगर

उसकी मौत में हम सब भागी है


ये अकेलापन कोई एहसास नहीं

सज़ा है जो इंसान को ख़ाक कर डालती है


कहते है जो अकेलापन इतना भी बुरा नहीं

लगता है उन्होंने कुछ खोया ही नहीं है 


खुदग़र्ज़ी को ख़ुद से इश्क़ कहना

कायरता है अकेलापन नहीं है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract