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Seepika Khandelwal

Inspirational


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Seepika Khandelwal

Inspirational


ऐ अम्बर के दीपो

ऐ अम्बर के दीपो

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ऐ अम्बर के दीपो, कह दो उस मालिक से

बिलख रही है धरा तेरी न जाने कब से|

जो झूमती थी, गाती थी नाचती थी

नदियों, भूधरों, तड़ागों की स्वामिनी थी|

चुनरिया धानी ओढ़ती थी

सुमन सुरभि से महकती थी|

कलरव से पंछी के चहकती थी

निर्झर सी जो खिलखिलाती

पयोधि को सीने से लगाती|

वो आज खुद ही तड़प रही है

तड़प रही है तेरी वसुधा न जाने कब से...


ऐ अम्बर के दीपो कह दो उस मालिक से

सीने से जिनको अपने लगाया

कदमों को जिनके दिल पे सजाया|

माँ जैसे जिनको खिलाया पिलाया

शीतल मरुत झोकों से जिनको सुलाया|

रहने को बसेरा मैंने दिलाया

उन्होंने ही मेरा मस्तक झुकाया|

कुदृष्टि डाली है नारी सम्मान पर

उसको इन्होंने खिलौना बनाया|


दुखता है दिल इनकी बातों से

जिन्होने मर्यादा की सीमाएं लांघी हैं

मानव भी कहलाने के अधिकारी नहीं वो

मुझ पर भी रहने के अधिकारी नही वो|

ओ वनिता पर टेढ़ी नज़रों वालो

कुसंस्कारों के ए पिटारों|

बाज आ जाओ अब इन हरकतों से|

ऐ अम्बर के दीपो कह दो उस मालिक से|


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