STORYMIRROR

Mona Patel

Abstract

4  

Mona Patel

Abstract

आंखें खोल बोल सीधी बात

आंखें खोल बोल सीधी बात

1 min
207

सीधा चश्मा पहन के,

बीना शोर शराबे के,


ऐक एक की पोल खोलता हूं,

मैं टेढ़ी नहीं सीधी बात करता हूं,


सोच के समाज के हर बात में बोलता हूं,

अफाओ के दौर में मैं,

सीधी बात करता हूँ,


हाथों में कलम हैं, हथियार नहीं,

लिखने की ताकत है,

जो घाव भी देता है,


मलहम भी लगता है,

सच बोलने की साझा भी पाता है,

लेकिन मैं सीधी बात ही करता हूं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract