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अनोखा बर्थडे गिफ़्ट
अनोखा बर्थडे गिफ़्ट
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© Pawan Kumar

Children Drama

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'सर आप मेरे बर्थडे में आओगे न, बोलो न सर आओगे न ? पापा बोलो न सर को, वो भी मेरे बर्थडे में आयें' ....नन्हे रुम्मी ने जब बड़े इसरार के साथ अपने पापा से अपने होम टयूटर अजय को अपने जन्मदिन के लिए आमंत्रित करने को कहा तो मिस्टर कपूर को बेमने से अजय को अपने बेटे के जन्मदिन पर बुलाने का तकल्लुफ़ करना पड़ा ।

अजय दिल्ली के एक बेतरीब इलाके कोटला मुबारकपुर में अपने ६ साल के बेटे गुड्डू और अपनी शरीक़े हयात नविता के साथ रहा करता था और अपनी औकात बसर के लिए घर घर जाकर होम ट्यूशन पढाया करता था ।उसने मिस्टर कपूर के बेटे रुम्मी को यही कोई दो महीने पहले पढ़ाना शुरू किया था । इन दो महीनों के मुख़्तसर वक़्त में ७ साल का नन्हा रुम्मी अजय से बेहद घुल मिल गया था, इतना कि वह अजय से अगले हफ़्ते होने वाले अपने जन्मदिन की पार्टी में आने की ज़िद करने लगा और जब इससे भी उसे तसल्ली नहीं हुई तो उसने जिद करके अपने पिता से अजय को जन्मदिन में आने का न्योता दिलवा डाला । वह न्योता देकर और वह न्योता पाकर मिस्टर कपूर और अजय दोनों हीं काफी परेशां थे ।

मिस्टर कपूर का बड़ा लम्बा चौड़ा कारोबार था और यकीनन मुनाफ़ा याफ़्ता भी तभी तो जोर बाग़ की उनकी विशाल कोठी में ऐशो-आराम की तमाम सामानें भरी पड़ी थी । मिस्टर कपूर अपने रुतबे को लेकर बड़े संजीदा थे और मंहगे ब्रांडों से तो ख़ास हीं निस्बत थी उन्हें ।उनके घर का साज-सामान, अटारी चौपारी, झाड़ झूमर सब ब्रांडेड था । यहाँ तक कि उनकी कोठी की चौकीदारी करने वाले चौकीदार भी ब्रांडेड यूनिफार्म पहना करते थे । अब ऐसे एशो-इशरत से भरे ज़गह में अजय जैसा कोई मामूली शख्स रोज रोज अपनी खड़खड़िया साइकिल में सवार हो बोसीदा से कपड़े और घिसे सैंडल पहनकर आया करे, यह बात मिस्टर कपूर के लिए नाकाबिले बर्दाश्त थी पर बेटे की पढाई की ख़ातिर उन्हें दूध में पड़ी मक्खी निगलनी पड़ रही थी । ट्यूटर अजय और उसकी मुफ़लिस-आलूदा पहनावों को झेलना पड़ रहा था । आजकल अच्छे ट्यूटर मिलते कहाँ हैं । बहुत ढूँढा तो यह अजय मिला । पर वह मन्कूब ट्यूटर जन्मदिन का भी हिस्सा बन जाए, उस जश्न का भी जिसमें सिर्फ मिस्टर कपूर के दर्जे के हैसियत वाले लोग आते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है । मिस्टर कपूर के यहाँ उनके आले-शानी की नुमाइश देखने आने वाले बड़े बड़े कद्दावर लोग, उन्हें जब अजय का अफसुर्दा चेहरा, सस्ती कमीज़ और घिसी सैंडल दिखेगी तो वे मिस्टर कपूर के बाबत क्या सोंचेंगे । क्या इज्ज़त रह जाएगी उनकी ! मिस्टर कपूर यह सोंच सोंच कर पेरशान थे ।

‘हाँ हाँ सर आप भी आइये न ‘इस बात को बोलकर मिस्टर कपूर जितने परेशां थे, इस बात को सुनकर अजय भी उतना हीं परेशां था । मिस्टर कपूर के परेशानी का सबब तो सिर्फ एक था पर अजय के सामने तो कई सारी परेशानियां मुंह बाए खड़ी थी । जश्न के दिन वह क्या पहने, उसके पास तो पहनने के नाम पर चिथड़ों के अलावा कुछ नहीं ......चलो किसी जान पहचान वाले से वह कपडे उधार ले भी आये पर जन्मदिन की सौगात का क्या ।एक बेहद हीं रईस बाप के बच्चे को सौ दो सौ रूपये की चीज़ देकर तो टरकाया भी नहीं जा सकता । अजय अब शामो शब इसी उधेड़बुन में डूबा रहता था । उसके मन में एक आध दफ़ा यह ख्याल भी आया कि वह रुम्मी के जन्मदिन के जश्न में ना जाकर सारे पेचोखम से बच जाए पर किसी के इतने प्यार से दिए बुलावे को नज़र अंदाज़ करने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाया और रुम्मी के जन्मदिन के पार्टी में शरीक़ होने की वह पुरज़ोर तैय्यारी करने लगा ।

उसने दुकानों के चक्कर लगा कर भी देख लिया था । एक ठीक ठाक कद का टेडी बियर हज़ार रूपये से कम में नहीं आ रहा था ।हेलीकाप्टर, रिमोट कार सब उसकी पहुँच के बाहर थे । पर कुछ तो करना था वरना अजय की फजीहत हो जाती । बच्चा नहीं बच्चे के बाप की नज़रों में या शायद मेहमानों की नज़रों में वह माखौल का पात्र बन जाता । अजय को तो एक आध रात यह दुस्वप्न भी आ गया कि वह एक छोटा सा खिलौना लेकर रुम्मी के जन्मदिन के जश्न में गया है और उसने मेहमानों द्वारा दिए बेशकीमती खिलौनों के बीच अपनी छोटी और मामूली सी सौगात रखी है जिसे देखकर सभी मेहमान बेइख्तियार हँसे जा रहे हैं ।

अजय ने बड़ी जोड़ तोड़ की, तब भी हाथ में ३०० रूपये से ज़्यादा कुछ नहीं आया । रुम्मी के जन्मदिन में अब सिर्फ तीन दिन बचे थे । वह उन पैसों को ले बाज़ार आ गया और दुकान में पड़ी सुन्दर सुन्दर चीजें उठाकर दुकानदार से उनकी कीमत पूछने लगा । वह क्रमवार तरीके से बड़ी से छोटी चीजों को चुनता गया पर दाम पूछने पर उसे वही उसकी पहुँच के बाहर के अप्रिय दाम सुनने को मिले ।दुकानदार भी जब दाम बता बता कर आजीज़ हो गया तो उसने झल्ला कर अजय से पूछ डाला ‘भाई साहब अपना रेंज बताएँगे ताकि आपको आपके मतलब की चीज़ दिखा संकुं ।’अजय ने जब कहा ३०० रूपये तो दुकानदार ने एक मामूली सा खिलौना लाकर अजय के सामने रख दिया । अजय ने खिलौने की निरख परख की और फिर उदास भाव से वहां से चला गया ।

हर शाम जब अजय ट्यूशन पढ़ाकर लौटा करता था, घर की दहलीज के अन्दर कदम रखते हीं, उसका बेटा गुड्डू उससे लिपट जाता था और अजय के जेब और थैले की टोह लेता बड़े उम्मीद से पूछता था ‘पापा मेरे लिए खिलौने लाये क्या ? अजय के पास उस वक़्त गुड्डू को देने के लिए सिवाय दिलासों के बताशे के कुछ नहीं होता था । पैसे के अभाव में वह पिछले दो महीने से अपने बेटे के खिलौने की रट को टालता रहा था पर इस बार लोक लज्जा की संक्रामक बीमारी ने उसे ऐसा धर दबोचा कि उसने अपने रईस विद्यार्थी रुम्मी को उसके रुतबे के मुताबिक़ सौगात देने के लिए अपनी खस्तगी को नज़र अंदाज करते हुए बेइम्तहाई की हद पार कर दी । उसने अपने आमदो-रफ़्त का ज़रिया, अपनी इकलौती अलामत, अपनी साइकिल को बेच दी और उस पैसे से एक ऐसा महंगा खिलौना ख़रीद लाया जो उसे रुम्मी की हैसियत के मुनासिब लगा । वह खिलौना खरीदने जब वह खिलौने की दुकान पर गया था तो उसके रोज रोज के बेमायने के चक्कर से बुरी तरह चिढ़े दुकानदार ने उसे दुकान की सीढ़ियों से हीं चलता करने की कोशिश की थी पर जब अजय ने उसे अपने जेब में पड़े चंद हरे हरे नोट दिखाए तो दुकानदार की तस्ल्ल्ली बंधी और उसने अजय को आने दिया । वहां से अजय जब खिलौना खरीदकर घर पहुंचा तो उसका बेटा गुड्डू पहले तो अजय द्वारा लाये खिलौने को अपने निमित्त समझकर बड़ा खुश हुआ पर जब उसे पता चला कि वह खिलौना किसी और के लिए हैं तो उसने रो रोकर सारा असमान अपने सर पे उठा लिया । वो तो ग़नीमत थी कि नींद उसके पलकों पर ज़ल्दी काबिज़ हो गयी और वह रोता रोता सो गया वरना उस दिन अजय के लिए रुम्मी को पढ़ाने जाना भी मुहाल हो जाता ।

‘अरे क्यूँ परेशां होते हो, बच्चे के बात को कौन इम्पोर्टेंस देता है, और आपने भी उसे कोई दवाब डाल कर थोड़े हीं कहा कि हाँ भाई ज़रूर आना । आई एम स्योर, वह नहीं आएगा ।’ मिसेज कपूर की इस तसल्ली ने मिस्टर कपूर को पल भर के लिए राहत तो दी पर फिर शक़ का एक गुबार उठा और उम्मीद को लील गया । ‘बट इन केस ही कम्स, कितनी बेईज्ज़ती होगी । ही वुड बी एन ऑय सोर ।' मिस्टर कपूर ने जब यह शक़ जतलाई तो मिसेज कपूर लाज़वाब होकर अपने पति के मानिंद गहरी चिंता में डूब गयी ।

अजय को बगैर साइकिल के रुम्मी के घर तक पहुचने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी । रस्ते में उसे थोडा बांयां दांयां डोल कर जश्न के दिन के लिए शर्ट उधार लेने अपने एक दोस्त के घर भी जाना पड़ गया था, जिससे उसका रास्ता थोडा लम्बा हो गया था । रुम्मी के घर में रुम्मी दो दिन बाद होने वाले अपने जन्मदिन के जश्न को लेकर बड़े जोश में था पर मिस्टर कपूर जाने क्यूँ थोड़े उखड़े उखड़े से दिख रहे थे ।हालांकि उन्होंने अजय से दो दिन बाद होने वाले जन्मदिन के जश्न में अजय की शिरकत के बाबत तस्कीन करते हुए पूछा भी था कि ‘मास्टर साहब आप आ रहे हैं न ‘पर अजय के हाँ में जवाब देने के बावजूद उनके चेहरे से वो रंज नहीं गया था । कारोबारी आदमी, कारोबार के उंच नीच के अनुसार इनके मिजाज़ का पारा भी ऊपर नीचे होता रहता है, अजय ने ऐसा सोंचकर मिस्टर कपूर के तल्ख़ मिजाज़ी को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और घर लौट आया । काश कोई उसे बताता कि मिस्टर कपूर परेशां थे क्यूंकि दो दिन बाद वह उनके शान में बट्टा लगाने उनके यहाँ होने वाले जश्न में आने वाला था ।

ग़रीबों की दौलत उनका संतोष होता है और ग़रीब के बच्चे भी बचपने में हीं इस अलामत के मालिक हो जाते हैं । तभी तो घंटों सर धुनने वाला गुड्डू घर में पड़े खिलौने को देखकर भी शांत था । हाँ गाहे बगाहे वह खिलौने के पास जाकर उसे निहार ज़रूर लेता था पर उसने अपने मन को यह समझा दिया था कि वह महंगा खिलौना किसी और के लिए है । किसी रईस बच्चे के लिए । रुम्मी के घर में जन्मदिन का जश्न कल था पर अजय आज हीं उस जश्न के मुताल्लिक सारी तैय्यारियाँ कर रहा था । उसने रुम्मी के लिए लाये खिलौने को रंगीन कागज़ में लपेट दिया था और उससे सलग्न बधाई के एक कार्ड में बड़ी तन्मयता से अपने खूबसूरत अक्षरों में रुम्मी के जन्म दिवस की शुभकामना का एक अच्छा सा फेंकरा भी लिख डाला था । उसने उधार लाये शर्ट को पहनकर अपने बीबी बच्चों से इस बात की तस्कीन भी कर ली थी कि वह पार्टी में उस पहनावे में कहीं कमतर तो नहीं लगेगा । तसल्लीबख्श जवाब पाकर हीं वह रुम्मी को पढ़ाने के लिए रवाना हुआ था । रास्ते भर उसके जागती आँखों में यह चित्रपट चलता रहा कि वह बन ठन कर रुम्मी के जन्मदिन की पार्टी में आया है और बड़े शान से वह रुम्मी को अपना लाया उपहार सौंपता है और रुम्मी और रुम्मी के माँ बाप उसके लाये उपहार को देखकर बड़े खुश होते हैं ।’अरे सर इसकी क्या ज़रुरत थी ‘अगर रुम्मी के माँ बाप ने ऐसा कहा तो वह क्या कहेगा उसने वह जवाब भी सोंच रखा था । इन्हीं खुशपोश ख्यालों में डूबा अजय रुम्मी के घर के बाहर पहुंचा और रोज की तरह रुम्मी के बंगले के बाहर के गेट की घंटी बजाई । रोज की तरह एक चौकीदार गेट में बने एक चकोर छोटे से दरीचे से नमूदार हुआ पर रोज की तरह उसने आज दरवाजा नहीं खोला । उसने उस दरीचे से झांकते हुए अजय से मुख़ातिब हो कहा ‘मास्टर साहब रुम्मी के पापा ने रुम्मी के लिए कोई और ट्यूटर रख लिया है, अब आपको आने की ज़रुरत नहीं ।'

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