वह आवाज़ मेरी थी ही नहीं
वह आवाज़ मेरी थी ही नहीं
मेरे भीतर एक आवाज़ रहती थी।
उसका कोई चेहरा नहीं था। कोई नाम नहीं था। फिर भी मैं उसे पहचानती थी। क्योंकि वह मेरी ही आवाज़ में मुझसे बातें करती थी।
"मत भेजो।"
मैंने कहानी लिखकर स्क्रीन पर उँगली रोक ली।
"लोग हँसेंगे।"
मैंने फ़ाइल बंद कर दी।
यह पहली बार नहीं था।
कई सालों से मेरी ज़िंदगी का हर अधूरा सपना किसी न किसी "कल" के नाम गिरवी रखा हुआ था।
एक अधूरी पेंटिंग।
एक अधूरा गीत।
एक अधूरी नौकरी।
एक अधूरी मोहब्बत।
और सबसे ज़्यादा... एक अधूरी मैं।
उस रात बिजली चली गई।
घर में अँधेरा था। मैं मोमबत्ती जलाकर अपनी पुरानी डायरी ढूँढ़ने लगी। जाने कैसे, अलमारी के सबसे पीछे से बचपन की एक छोटी-सी कॉपी हाथ लग गई।
पहले पन्ने पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था
"जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मैं दुनिया की सबसे अच्छी कहानियाँ लिखूँगी।"
मैं मुस्कुराई।
अगला पन्ना खोला।
लाल स्याही से लिखा था
"कहानियाँ लिखकर पेट नहीं भरता।"
मैं ठिठक गई।
यह मेरी लिखावट नहीं थी।
यह पापा की थी।
मुझे याद भी नहीं था कि उन्होंने कभी यह लिखा था।
मैंने आगे पढ़ा।
एक पन्ने पर
"इतनी ज़ोर से मत हँसो, लड़कियाँ अच्छी नहीं लगतीं।"
माँ की लिखावट।
दूसरे पन्ने पर
"तुम्हारी बहन तुमसे ज़्यादा होशियार है।"
चाचा की लिखावट।
एक और पन्ना
"गलती मत करना। लोग याद रखते हैं।"
स्कूल की अध्यापिका।
मैं पन्ने पलटती गई।
हर पन्ने पर कोई न कोई था।
पर... कहीं भी मैं नहीं थी।
उस रात पहली बार मुझे अपने भीतर की आवाज़ अजीब लगी।
वह कह रही थी
"देखा? इसलिए कोशिश मत करो।"
मैंने धीमे से पूछा,
"तुम हो कौन?"
कमरे में सन्नाटा था।
आवाज़ फिर आई
"मैं तुम्हें बचाती हूँ।"
"किससे?"
"हार से।"
"या कोशिश से?"
पहली बार... वह चुप हो गई।
अगले कुछ दिनों में मैंने अपने भीतर उठने वाली हर आवाज़ को सुनना शुरू किया।
जब भी वह कहती
"तुमसे नहीं होगा।"
मैं पूछती
"यह बात सबसे पहले किसने कही थी?"
और जैसे किसी पुराने कमरे की धूल उड़ती हो, वैसे ही यादें लौटने लगीं।
वह मेरी आवाज़ नहीं थी।
वह उन लोगों की गूँज थी जो मुझे प्यार तो करते थे, पर अपने डर के चश्मे से देखते थे।
पापा असफलता से डरते थे।
माँ समाज से।
टीचर गलती से।
रिश्तेदार तुलना से।
उन्होंने अपने-अपने डर मुझे सौंप दिए थे।
मैंने उन्हें अपना स्वभाव समझ लिया।
कुछ दिन बाद मेरी भतीजी घर आई।
उसने एक चित्र बनाया।
आसमान हरा था।
पेड़ नीले थे।
सूरज बैंगनी।
मैं अनायास बोलने ही वाली थी
"ऐसे रंग नहीं होते..."
लेकिन शब्द होंठों तक आकर रुक गए।
अचानक मुझे अपना बचपन याद आ गया।
शायद किसी दिन मैंने भी बैंगनी सूरज बनाया होगा।
और शायद उसी दिन किसी ने मेरे भीतर पहली ईंट रख दी होगी।
मैंने उसकी ड्रॉइंग देखकर सिर्फ़ इतना कहा
"कहानी सुनाओ... इस आसमान का रंग हरा क्यों है?"
उसकी आँखें चमक उठीं।
उसने पूरे विश्वास से एक ऐसी दुनिया बना दी जहाँ पेड़ रात को चाँदनी पीते थे और इसलिए नीले हो जाते थे।
मैं उसे देखती रही।
बच्चे कल्पना से नहीं डरते।
हम उन्हें डरना सिखाते हैं।
उस शाम मैंने अपनी अधूरी कहानी फिर खोली।
उँगलियाँ कीबोर्ड पर थीं।
आवाज़ लौट आई।
"अभी भी समय है। मत भेजो।"
इस बार मैंने उसे डाँटा नहीं।
मैंने बस मुस्कुराकर पूछा
"तुम्हारी उम्र कितनी है?"
कोई उत्तर नहीं।
"सात साल?"
सन्नाटा।
"या दस?"
कुछ नहीं।
मुझे समझ आ गया।
मेरे भीतर जो मुझे रोकता रहा... वह कोई राक्षस नहीं था।
वह मेरे ही भीतर बैठा एक डरा हुआ बच्चा था।
जो अब भी सोचता था कि एक गलती पूरी दुनिया ख़त्म कर देगी।
मैंने आँखें बंद कीं।
मन ही मन उसका हाथ पकड़ा।
"चलो।"
वह बोला,
"अगर लोग हँसे तो?"
मैंने कहा,
"तो इस बार हम दोनों साथ हँसेंगे।"
मैंने कहानी भेज दी।
उस रात मुझे नींद नहीं आई।
सुबह मोबाइल खोला।
कोई उत्तर नहीं था।
दोपहर तक भी नहीं।
शाम तक भी नहीं।
और तभी मुझे एहसास हुआ...
सबसे बड़ा बदलाव यह नहीं था कि किसी ने मेरी कहानी पढ़ी या नहीं।
सबसे बड़ा बदलाव यह था कि पहली बार मेरा दिन किसी और के निर्णय पर नहीं टिका था।
मैंने अपने भीतर एक दरवाज़ा खोल दिया था।
कई महीने बाद मेरी कहानी छपी।
कुछ लोगों ने बहुत तारीफ़ की।
कुछ ने कमियाँ निकालीं।
कुछ ने पढ़ी ही नहीं।
पहले जैसी दुनिया ही थी।
सिर्फ़ एक चीज़ बदल गई थी।
अब कोई भी बाहरी आवाज़ मेरे भीतर घर नहीं बना पाती थी।
क्योंकि मेरा घर अब खाली नहीं था।
वहाँ मेरी अपनी आवाज़ रहने लगी थी।
और वह अजीब थी।
वह कभी यह नहीं कहती थी
"तुम सबसे अच्छी हो।"
वह बस इतना कहती थी
"तुम सच्ची हो... इतना काफ़ी है।"
आज भी वह पुरानी आवाज़ कभी-कभी लौट आती है।
धीरे से कान में फुसफुसाती है
"अगर तुम हार गईं तो?"
मैं अब भी उसे सुनती हूँ।
क्योंकि कुछ आवाज़ों को ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
लेकिन अब मैं हर बार उससे एक ही बात कहती हूँ
"डरना तुम्हारा अधिकार है...
फैसला मेरा।"
और शायद उसी दिन पहली बार मुझे समझ आया...
मैं पूरी उम्र खुद से नहीं लड़ रही थी।
मैं उन वाक्यों का बोझ ढो रही थी जो कभी किसी और ने कहे थे।
जिस दिन मैंने वे सारे वाक्य उनके मालिकों को लौटा दिए...
उसी दिन पहली बार...
मेरे भीतर मेरी अपनी आवाज़ जन्मी।
- पूनम बगई
