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Asha Jha

Drama Fantasy

4  

Asha Jha

Drama Fantasy

फिर आया वसंत

फिर आया वसंत

11 mins
360

माधवी अपने जीवन के बारे में विचारमग्न अस्ताचलगामी अरुण की ढलती धूप में बैठ कर चाय पी रही है। मंद-मंद वसन्तीय हवा चल भी अपना प्रभाव दिखा रही है। जिस कारण वातावरण में कुछ ठंड का अनुभव हो रहा है।

उसके घर में उसकी सबसे अधिक प्रिय जगह है उसके द्वारा लगाई गई उसकी बगिया। जहाँ उसने अपने समय व्यतीत करने के उद्देश्य से नाना प्रकार के पौधे लगा रखे हैं। बगिया की ओर नजर जाने पर उसे चहुँ ओर पुष्प ही पुष्प नजर आए। मानो प्रकृति ने नया श्रंगार किया हो। वो उन सुरभित पुष्पों को देखकर मन ही मन सोचने। लगता है वसंत का मौसम आ गया । काश ऐसा ही वसंत उसके भी जीवन में आ जाये। मन ही मन वसंत को सम्बोधित करते हुए कहने लगी--


बोलो वसंत क्या तुम फिर आओगे

बन बहार फिर छा जाओगे

छूट गए जो रंग जीवन के

क्या वो रंग पुनः भर पाओगे

पतझड़ से रीते अंतर्मन को

एक नयी उमंग दे पाओगे

बूढ़े वृक्ष ठूंठ सम जीवन को

श्रंगार एक नया दे पाओगे

बोलो वसंत क्या तुम फिर आओगे

निशब्द, नीरव से जीवन में

कोयल सी कूक सुना पाओगे।।


फिर स्वयं ही प्रतिउत्तर देते हुए बोली। अब मेरे जीवन में वसंत कैसे आ सकता है। अब तो जीवन में पतझड़ का मौसम का आरंभ हो गया है। काश कि बीता समय लौटा पाती। तो कुछ पल चुरा कर फिर जीवन के वसंत को जी पाती। वो अपने जीवन के बारे में सोचने लगी। मेरे पास सबकुछ तो है। पति है, जो जीवन की सारी सुविधाएं दिए हुए है। बस बेचारे समय ही नहीं दे पाते। बाहरी दुनिया के बोझ तले दबे, दुनिया जहान का दबाव झेलते ही उनका सामर्थ्य चूक जाता है। दो मीठे शब्द भी शायद उसी बोझ तले दबे जाते हैं। बच्चे है जो उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए। अब उनके पास भी हमारे लिए समय नहीं। जब छोटे थे तो उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में ही समय निकल जाता था। पतिदेव की उपेक्षा उतनी बुरी नहीं लगती थी। परंतु अब तो ये खालीपन काटने को दौड़ता है। जब तक सास-ससुर रहे घर में भले ही काम अधिक रहा परन्तु जीवंतता लगती रही। अब तो घर में कोई बोलने -सुनने वाला नहीं है। काम बाली से भी कितना बतियाया जाये। वैसे भी उनका कोई विश्वास नहीं। कब किस बात को नमक मिर्च लगाकर किस दिशा में मोड़ दे। 

माधवी को गहन विचार में देख कामवाली अन्दर आते हुए बोली- क्या बात है दीदी। किस विचार में खोए हो। कुछ नहीं, तुम जाकर अपना काम खत्म करो। तभी उसका फोन बज उठा। उठाया तो पता चला पतिदेव का है। उनको ऑफिस के काम से पंद्रह दिनों के लिए मालदीव जाना है। उनके पास अधिक समय नहीं इसलिए ड्राइवर को भेज रहे हैं। उनका सामान पैक करके उसको देना है। मोबाइल पर समय देखा तो सन्ध्या के छः बजे रहे हैं। आधे घंटे में ड्राइवर आ जायेगा। तो अब उसके पास मात्र आधे घंटे का समय था सूटकेस लगाने के लिए। वो फुर्ती से उठी और सभी आवश्यक सामान सूटकेस में जमाने लगी। साथ ही याद भी करती जा रही थी कि कुछ छूट तो नहीं रहा। वरना विपुल जी बहुत नाराज होंगे। पिछली बार गलती से दो शर्ट कम रखी थी तो कितना क्लेश किया था विपुल ने। उनको किसी भी बात की कमी हो जाये तो समझ लो महाभारत करने की वजह मिल गयी। उसको बेइज्जत करने का सुअवसर मिल गया। जिसे वो कभी हाथ से नहीं जाने देते। कितना सुनाया था उसने माधवी को, कहाँ दिमाग रहता है तुम्हारा। कोई काम नहीं घर में, पर फिर भी यदि कोई काम बोल दो तो आधा अधूरा ही करोगी। अरे दिन भर आराम करते हुए भी थकती नहीं तुम। एक मैं हूँ कि तुम्हारे और बच्चों के लिए दिन-रात एक किये जा रहा हूँ। तुम्हें क्या तुम तो ऐश करो बस। याद कर ही माधवी के रोंगटे खड़े हो गए। सारे सामान को ध्यान से एक नजर देख आश्वस्त हुई कि कुछ नहीं छूटा है। तभी दरवाजे की घण्टी बजी। जब तक माधवी सूटकेस कमरे से बाहर लायी कामवाली ने दरवाजा खोल दिया था। माधवी को देख वो चुपचाप अपना काम खत्म करने चली गयी। माधवी ने चुपचाप सूटकेस की ओर इशारा कर दिया। ड्राइवर सूटकेस उठा चलता बना।

      माधवी अब अपने को बहुत अधिक अकेला महसूस कर रही थी। तभी कामबाली भी काम खत्म कर चली गयी। ऐसा नहीं था कि विपुल पहली बार उसे अकेला छोड़ कर गया हो। पर पहले परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक थी तो अधिक पता नहीं चलता था अकेलापन। पर जैसे-जैसे परिवार के सदस्य कम होते गए ये अकेलापन महसूस होने लगा। अभी तक तो बेटी साथ में थी पर तीन माह पहले ही वो भी चंडीगढ़ चली गयी पढ़ाई के लिए। तब से पहली बार था कि विपुल का बाहर जाने का कार्यक्रम बना हो। या हो सकता है कि उसने जाना टाला हो जाना। पर अब जाना उसकी विवशता हो। वैसे भी विपुल के रहने पर भी दिन भर तो वो अकेली ही रहती थी। विपुल देर रात्रि घर आता था। खैर कुछ भी हो। रहना तो पड़ेगा ही। ये अकेलापन ही उसका साथी है अब।

    कुछ सोच कर उसने अपनी एकमात्र सखी वसुधा को फोन लगा दिया। कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद जैसे ही वसुधा को पता चला कि माधवी अकेली है। उसने झट घूमने चलने का प्रस्ताव रख दिया। वसुधा- देख मनु ,तुम इन पंद्रह दिनों तक करोगी क्या। चल न कहीं घूम कर आते हैं। तुम विपुल से हाँ करवाओ। मैं इनको धमकाती हूँ। बहुत दिन से कही गये नहीं हैं तो ऊबाउपन सा लग रहा है। ठीक है, कल बताती हूँ पूछकर। माधवी ने फोन बोलकर फोन रख दिया। 

     अगले दिन विपुल ने जैसे ही पहुँचने की सूचना देते हुए बताया कि अब शायद प्रतिदिन फोन न कर पाऊँ। तो माधवी ने कुछ संकोच से पूछा- वो वसुधा कहीं घूमने जाने का बोल रही थी। क्या मैं जाऊँ? विपुल- कहाँ जाओगी? माधवी- पता नहीं। तुमसे पूछा नहीं था तो कुछ पक्का नहीं था कहाँ जाना है विपुल- ठीक है। जहाँ जाना हो चली जाओ। बस बारह दिन में वापस आ जाना। क्योंकि दो दिन बाद ही मैं लौट आऊँगा और मुझे तुम घर पर अपनी नजरों के सामने चाहिए। माधवी- मन ही मन कुछ नाराजगी से, ठीक है  आ जाऊँगी। माधवी मन में बड़बड़ाते हुए- ह्म्म्म--- बड़े आये, मुझे तूम घर पर चाहिए। 

   पर अगले ही पल उसने विपुल की ओर से अपना ध्यान हटाकर घूमने जाने की ओर लगाना उचित समझा। कारण वो विपुल को बीस वर्षों से जानती थी, वो ऐसा ही है। अब तो उसने विपुल के बारे में सोचना भी बन्द कर दिया था। उसने वसुधा को फोन लगाकर जाने की सहमति देते हुए पूछा- कहाँ चलोगी वसु? हम लोगों के पास दस दिन हैं घूमने के लिए। वसुधा- ठीक है। मैंने अरुण से बात की थी जाने की। उनकी परिचित एक ट्रेवल एजेंसी है जो कल हरिद्वार की यात्रा पर कल निकल रही है। सबसे ज्यादा खुशी की बात है कि उसमें जाने वालों में चार लोगों ने अपनी बुकिंग कैंसिल की है। तो मैं ,तुम, अरुण और उनके एक मित्र रजत जी चल रहे हैं। ठीक है, मैं जाने की तैयारी करती हूँ।

    अगले दिन नियत जगह पर अपने लगेज के साथ माधवी उपस्थित हो गयी। कुछ ही देर में वसुधा भी अरुण के साथ आ गयी। दोनों सखियाँ गले मिली और अरुण को अभिवादन कर दोनों अपनी जगह पर जा बैठी। सामान व्यवस्थित कर दोनों ही अपनी गप्पों की दुनिया में खो गयी। कुछ घण्टों की यात्रा के बाद बस एक ढाबे पर रुकी। सबको चाय नाश्ते के लिए बोल दिया गया। माधवी और वसुधा एक टेबिल पर बैठ गयी। तभी सामने से अरुण के साथ एक व्यक्ति और चला आया। आते ही उनकी टेबिल पर बैठ गया। वसुधा ने उस अजनबी से परिचय कराते हुए कहा- माधवी ये हैं अरुण के मित्र रजत जी,और रजत ये है मेरी परम प्रिय सखी माधवी। दोनों ने ही मुस्कुराकर एक दूसरे को देखा। जलपान के मध्य रजत अपनी हल्की फुल्की बातों से सबको हँसाता रहा। समय होने पर जब वापस अपनी सीट पर बैठने लगे तो अबकी बार वसुधा अरुण के साथ बैठते हुए बोली- जरा पतिदेव पर भी ध्यान दे लूँ। वरना इनका मुँह बन जायेगा कि सखी मिली नहीं कि दुनिया भूल जाओ। माधवी ने भी मुस्कुराकर सहमति दे दी। तभी बगल वाली सीट पर रजत आकर बैठ गए। बोलने लगे- आप भी अकेली बैठी है और मैं भी, तो सोचा क्यों न आपके साथ बैठ जाऊँ। आपको भी जानने का अवसर मिलेगा और समय भी कट जायेगा। 

       कुछ संकोच के साथ माधवी ने सहमति दे दी। रजत अपने परिवार के विषय में बताने लगा। एक बेटी ही है जो बारहवीं में है। उसकी परीक्षा के कारण पत्नी नहीं आ पायी। मैं भी नहीं आना चाहता था पर अरुण को मना नहीं कर पाया। वो बोलने लगा कि वसुधा की सहेली साथ जा रही है। तो तुम भी साथ चलो। माधवी मुस्कुराकर रजत की सारी बातें सुनती रही। रजत ने उसके परिवार के बारे में जानकारी ली। फिर अचानक की कहने लगा एक बात पूछूँ ,आप कम ही बोलती हैं या मेरे सामने कम बोल रही हैं। मैं कम ही बोलती हूँ माधवी ने उत्तर दिया। ह्म्म्म---- कोई बात नहीं, हम आपको बोलना सिखा देंगे कहकर हंसने लगा। फिर वो अपने बचपन की, मित्र मंडली की, घर-परिवार और कार्यक्षेत्र की ढेरों बातें बताकर माधवी को हँसाने लगा। धीरे-धीरे माधवी भी उसकी बातों में रुचि लेते हुए कुछ कुछ जीवन अनुभव बताने लगी। बातों ही बातों में कब दोनों ही एक दूसरे से खुल गए पता ही नहीं चला। माधवी के स्कूल के किस्से सुनते हुए रजत बोल ही पड़ा। देखा मैंने आपको बोलना सिखा दिया न। जीवन की सुंदरता को मौन रह कर नहीं जिया जा सकता है। इसे जीना है तो खुलकर हँसना- मुस्कुराना पड़ेगा। तभी ये जीवन सुंदर लगेगा। बिल्कुल वसंत की तरह अन्यथा पतझड़ सा प्रतीत होगा। माधवी- बात तो आपकी सही है परंतु अकेले कैसे जीवन में वसंत लाया जा सकता है। पतिदेव को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। वैसे भी वो कम बात करने वाले व्यक्ति हैं। बच्चे अपने जीवन में व्यस्त है। बस वसुधा ही है जिससे हँस बोल सकती हूँ। वो भी घर परिवार वाली है तो समय की कमी उसके साथ भी है। रजत- अच्छा माधवी अगर बुरा न मानो तो क्या मुझसे मित्रता करोगी? मेरी भी कोई मित्र नहीं है। मैं भी जीवन में एक मित्र की कमी महसूस करता हूँ। एक ऐसी मित्र जिससे बिना किसी दूषित भावना से हँसा बोला जा सके। माधवी ने अपनी सहमति दे दी। 

    दोनों की मित्रता क्या हुई समय की गति इतनी तीव्र हुई कि कब वो लोग हरिद्वार पहुँच गए पता ही नहीं चला। रजत का हर समय माधवी का ध्यान रखना उसके मन को एक अलग ही सुकून देने वाला पल था। गंगा आरती, लक्ष्मण झूला, मनसा देवी के साथ साथ सभी दर्शनीय स्थलों के दर्शन ने माधवी के मन को एक अलग ही स्फूर्ति से भर दिया। नीलकंठ महादेव के दर्शन की चढ़ाई में पूरे समय रजत का माधवी के पीछे धीरे धीरे चलना बहुत अच्छा लगा। आवश्यकता पड़ने पर उसका हाथ थाम लेना, उसके साथ थक जाने पर बैठ जाना, ये वो छोटी छोटी बातें थी जिनसे हम अपने साथी की परवाह को समझते है। एक बार माधवी के मुँह से निकल ही गया। यदि आप साथ नहीं होते तो शायद ये यात्रा उतनी सुंदर, मनभावन न लगती। जितनी अभी लग रही है। ऐसा क्यों बोल रही हैं आप माधवी, रजत हैरानी से बोला। मैं इसलिए बोल रही हूँ कि आपके मेरे साथ होने से वसुधा भी मेरी ओर से कुछ निश्चिंत सी होकर यात्रा का आनंद ले पा रही है।अन्यथा उसका आधा ध्यान मेरी ओर रहता जिससे उसके और अरुण जी के मध्य कहीं न कहीं कुछ मतभेद अवश्य होता। जिसका प्रभाव इस यात्रा पर भी पड़ता। आप भी इस बात को समझ रहे होंगे कि हर दम्पति को थोड़ा समय सिर्फ एक दूसरे के लिए चाहिए होता है। जहाँ मध्य में कोई तीसरा न हो। शायद आप सही कह रही हैं। इसी सोच के कारण ही अरुण ने मुझे साथ आने को कहा। पर मेरी भी किस्मत खुल गयी। मुझे भी इस यात्रा में एक प्यारी सी, समझदार मित्र मिल गयी। आप हमारी मित्रता को निभाएंगी न। या फिर भूल जाएंगी। माधवी - नहीं, हमेशा प्रयास रहेगा निभाने का। दोनों ही इसी तरह की बातें करते हुए आगे बढ़ते रहे। तभी वसुधा और अरुण भी आते हुए दिख गए। दर्शन के बाद उन लोगों बहुत सारी फोटो के साथ इन खूबसूरत पलों को कैमरे में बन्द किया। कुछ समय बाद ही वापस आने की आवाज लगाई जाने लगी। 

 आज उनकी वापसी थी। लौटते समय सभी थकान के कारण बात करने की अपेक्षा आराम कर रहे थे। वही माधवी का मन जीवन के इस परिवर्तन को सोच रहा है। यदि आज इस यात्रा में रजत नहीं होते तो भी क्या ये सफर इतना ही खूबसूरत लगता। या मन की उदासी कहीं न कहीं बनी ही रहती। वो जब जब अरुण और वसुधा को देखती मन में एक कमी अवश्य उभरती। परन्तु रजत के संग ने उसके मन में एक अलग ही उत्साह और उमंग भर दिया। इस सफर तो अनमोल बना दिया। वाकई जीवन में एक मित्र अवश्य होना चाहिये जिसे आप अपने मन की बात कह सको। कभी वजह तो कभी बेवजह की बातों को कह सको। आज लग रहा है जैसे जीवन में वसंत फिर आ गया हो। 


आज वसंत फिर आया है, बन बहार छाया है

कर अंतर्मन सुरभित ,आज फिर गुनगुनाया है

जीवन की उबड़ खाबड़, कच्ची सी पगडंडी पर

बनकर एक हमराही, फिर से कदम बढ़ाया है।

अब वसंत फिर आया है, एक नयी तरंग लाया है

कर श्रंगार अनूठा धरा का, अहसास नया लाया है

निराशा भरी पतझड़ के, ठूंठ हुए तरु से जीवन में

आशा की नव कोपल, नयी साख से सजाया है।।


यात्रा की समाप्ति पर विदाई की बेला में भी मित्रता की आभा से दमकते चेहरे के साथ इस वादे के साथ माधवी ने रजत से विदाई ली कि वो इस मित्रता को भूलेगी नहीं। अपितु जब भी अपने को अकेला महसूस करेगी तो बेझिझक रजत को साधिकार परेशान करेगी। 



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