आंगन का फूल
आंगन का फूल
आषाढ़ का प्रथम दिन और मैं बैठी थी ,अपने घर में अपने... बालकनी के पास...बालकनी के नीचे ,मैंने देखा छोटी-छोटी पौधे निकल आए हैं,अचानक मुझे बचपन की याद आ गई जब मैं छोटी थी और मेरे आंगन में एक गड्ढा था उसमें एक लाल फूल का पौधा था पता नहीं कौन सा वह फूल था ...मुझे फूल का नाम भी नहीं पता था, लेकिन वह फूल मुझे अपनी और आकर्षित करती थी और मैं हर साल बरसात में उसे फूल का खिलाने का इंतजार करती थी बस एक ही दुबली पतली काया मानो देवलोक के देवता उसे पृथ्वी पर किसी भूल के कारण भेज दिया था। वो भी तो एक कुसुम ही थी...फूल की काया गर्मी बर्दाश्त नहीं पाती थी शायद इसी वज़ह से सुख जाती थी मुझे लगता था वो बारिश के प्रथम बूंद की प्यासी थी उसे भी आषाढी मेघ से प्रेम था। आषाढ़ के मेघ के प्रथम सानिध्य से वो खिल उठती थी, शायद देवलोक का ही कोई फूल हो ,लाल राखी नुमा फुल और उसके बीच से निकली हुई एक पीली डंठल जो मेरे मन को लुभाती थी .... मैं हमेशा सोचती थी कि कौन सा पुष्प है इसका नाम क्या है, खैर प्रेम में नाम का कोई महत्व नहीं है, प्रेम केवल प्रेम है तभी तो हर साल बचपन में मुझे उस फूल का खिलाने का इंतजार था, अधखुली कली को जब छूती थी मुझे लगता था उसे भी मेरी स्पर्श की चाहत थी।यह किस चीज की फुल है इस फूल से मेरा नाता क्या है मैं क्यों इसे अपना संबंध जोड़ लेती हूं क्या यह फूल मेरे पूर्व जन्म का कोई साथी था या कोई याद यह मेरे आंगन में खिला है हुआ था। जब थोड़ी बड़ी हुई तो आंगन को आंगन फिर से नया बनाया गया , मैं बोली इस गड्ढे को मत इस गड्ढे में प्लास्टर मत करो लेकिन लोगों ने मेरी फीलिंग को मेरी जज्बात को नहीं समझा और लोगों ने गड्ढे को भर दिया वह फूल मुझे कहीं नहीं देखा आज भी मैं जब किसी बगीचे में जाती हूं तो मुझे उसे फूल की तलाश रहती है ऐसा लगता है मानो उस से मेरा जन्म जन्म का नाता है। कौन सा फूल है क्या नाम है इससे कोई मतलब नहीं लेकिन उसे फूल ने मुझे खींच अपनी ओर पता नहीं उसे फूल का क्या नाम है फूलों की घाटी की भी शहर की वहां मैंने देखा इस फूल का फूल को लेकिन मैं इसके नाम को नहीं जानती ..मेरे आंगन का उस को लोगो ने काल का ग्रास बना दिया। शायद !अब मैं उसे और ना देख पाऊंगी ,क्योंकि मनुष्य आगे बढ़ाने की होड़ कितने सारे अनमोल वृक्ष, पेड़ पौधे को नष्ट कर देता उसे पता नहीं,और शायद मेरी वह फूल लाल पंखुड़ी वाली फुल जिसमें एक ऊपर से कई जैसी निकली हुई थी वह फूल मैंकहीं नहीं देखी शायद! मैं और देख नहीं पाऊंगी शायद फूल से मेरा कोई नाता हो शायद वह कोई स्वर्ग का फूल हो जो आने वाले समय में मुझसे दीदार करें ,जीते जी तो नहीं हो पाएगा उसे फूल का दीदार जब भी कभी यहां से जाऊंगी तो जरूर मिलेगी स्कूल से कहूंगी तुम कहां चले गए थे मैं हर साल सावन में मैं तुम्हारी इंतजार करती थी मेरे अपने तुम कहां चले गए थे। Sanju sharan
