STORYMIRROR

साधना कृष्ण

Abstract

4  

साधना कृष्ण

Abstract

श्राद्ध

श्राद्ध

1 min
368

जीवन धन को

कभी रुलाया,

कभी हँसाया।

ढीली पड़ गयी

रिश्ते का गाँठ,

दिन गुजरे बस

मन को मार।


आज जब वो

कहा विदा तो

रोते क्यों हो

तुम बुक्का फाड़।

पानी -पानी रटते

वो गया स्वर्ग सिधार,

तब देखो हो रहा

आज गंगाजल बौछार।


रोटी सूखी दिया नहीं

औ करे भोज विधान,

सच पुछो तो ये

लोक परंपराये

अब हो अमान्य

वरना ऐ मानव

तू कहलायेगा

नादान।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from साधना कृष्ण

Similar hindi poem from Abstract