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Shakuntla Agarwal

Others

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Shakuntla Agarwal

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रिश्तें

रिश्तें

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ज़माने भर में बनाते फ़िरते हैं हम रिश्तें,

अपने ही रिश्तों को अक्सर भूल जाते हैं,

स्वार्थ रूपी बाज़ार में,

रिश्तों को भी हम तोल - मोल जाते हैं,


रिश्तें वो हैं ज़नाब,

वक़्त - बेवक़्त काम आते हैं,

पर माया रूपी बाज़ार में,

हम रिश्तों को भट्टी में झोंक जाते हैं,

रिश्तें वो सोना हैं,

जो अग्नि में तपकर,

कुंदन बन निख़र जाते हैं,


रिश्तों की भी अज़ीब दास्ताँ है,

कितना ही कुचलों,

फ़िर भी प्यार रूपी अंकुर से,

फसलों की तरह लहलाहते हैं,

बाहों में फ़ैला, रिश्तों को जी,

आग़ोश में आते ही,

रिश्तें गरमाहट फ़ैला जाते हैं,


दफ़ना देते हैं हम रिश्तों को,

माया रूपी बाज़ार में,

रिश्ते फ़िर भी वक़्त पर,

ताबूत तोड़ क़ब्र में से बाहर आते हैं,

रिश्तों को ज़ियो ज़ी - जान से,

ये ज़िन्दगी में "शकुन",

फूलों की तरह महक फ़ैला जाते हैं!!


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