STORYMIRROR

Ruchi Sinha

Abstract

3  

Ruchi Sinha

Abstract

मंज़िल

मंज़िल

1 min
241

मंज़िल की तलाश में,

बढ़ चले हैं कदम,


जाना है किस ओर,

यह समझ सके ना हम !


ख़ैर ! रस्ते खुद बना लेंगे,

कोशिश कभी होगी ना कम,


आखरी सॉंस में ही सही,

पर मंज़िल तो पायेंगे हम।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Ruchi Sinha

सपना

सपना

1 min पढ़ें

मंज़िल

मंज़िल

1 min पढ़ें

ऐ हवा

ऐ हवा

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract