मेरी किताब के पन्ने...
मेरी किताब के पन्ने...
मेरी किताब के पन्ने हो गए
सारे अलग-अलग
जोड़े कई तरीक़ों से
अर्थ निकाले अलग अलग
एक पन्ना मुझसे खो भी गया
और जो बचे मेरे पास है
उनके मायने कुछ निराश है
उस पन्ने की मुझे तलाश है
फिर एक दिन
कुछ यूँ सोचा
क्या उस एक पन्ने का
मैं इतना हूँ मोहताज
क्या सार है वो मेरी किताब का ?
क्या वो ही है सरताज़ ?
फिर मैंने एक कोरा काग़ज़ लिया
अपने मन से कुछ लिख भी दिया
रखा दिल में थोड़ा सम्बल
की अपनी किताब खुद मुकम्मल ।
जो मेरा पन्ना ना खोता
मेरे साथ ये वाक़या ना होता
चलता किताब की राह पर
न मैं खोता
न रास्ता खोजता।
आज इतने दिनों बाद
मुझे ये लगता है
वो पन्ना मुझे मिलने से डरता है
उसकी जगह मेरा लिखा पन्ना
शान से अब जो रहता है।
