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Vivek Jee

Romance

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Vivek Jee

Romance

मैं हर रोज़ सोचता हूं

मैं हर रोज़ सोचता हूं

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मैं हर रोज सोचता हूं के

नहीं लिखूंगा उसे अपनी शायरी में।

हटा दूँगा उसे दिमाग से अपने।

मिटा दूँगा उसे ख्यालों से अपने।

मैं अपने कलम कि स्याही से

उसे कागज़ पर नहीं उतरने दूँगा।

मगर लफ्ज़ दर लफ्ज़ हवा के रास्ते

हौले हौले वो कागज़ पर उतरती जाती है

जितनी भुलाने की कोशिश करता हूं उसे

वो उतना ही याद आती है।


यूं तो कई मर्तबा कोशिश की है

मैंने वो कागज़ जलाने की

उसकी यादों को राख बनाने की,

जला दिए मैंने वो सब खत

जो उसके लिए लिखे थे कभी।

अब उसी राख में उसका प्यार ढूँढता हूं।

चाहता हूं के ना लिखूं उसे,

ना नाम लूं उसका।

पर उसके बगैर,

मैं खुद के होने पर ही सवाल पूछता हूं।


मैं हर रोज सोचता हूं,

बस बहुत हुआ अब और नहीं।

उसका ज़िक्र अब कल नहीं होगा।

सो जला देता हूं नंबर उसका।

मिटा देता हूं तस्वीर उसकी।

मिटता जाता हूं वो हर चीज

जो उसकी याद दिलाती है।

मगर मैं बेबस,

उसके नाम की आवाज़ तो

यहां मेरे दिल से आती है।


लगता है उसकी यादें मिटाने को

मुझे खुद को ही मिटाना होगा।


मैं हर रोज सोचता हूं, के

नहीं लिखूंगा अब कभी भी उसको

पर उसके बगैर।

मैं खुद को होने पर ही सवाल पूछता हूं।

उसकी यादों की राख में,

अपनी ज़िन्दगी ढूँढता हूं।

मैं हर रोज़ सोचता हूं...


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