STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

काश

काश

1 min
256


कैसा ये हुड़दंग मचा है

गाँव शहर हर ओर,

गाँव गली हर डगर डगर

अंजाना सा शोर।

मस्त हैं अपने में सब

जब से हुआ है भोर,

उछलकूद रहे हैं सारे

बूढ़े बच्चे मोर।

नहीं किसी की उत्सुकता का

जैसे कोई छोर,

एकदूजे को करता जाता

रंगों से सराबोर।

जैसे आज मिटा देंगे

हर ऊँच नीच की दीवारें, 

एक जगह लाकर छोड़ेंगे

हम सबकी दीवारें।

काश, हमारी ये मंशा

हो जाती यदि पूरी,

सुख की नींद हम सो पाते

अपना पाँव पसारे।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract