जिन्दगी का सफर
जिन्दगी का सफर
क्या बताऊँ कि जिन्दगी के इस सफ़र मॆं क्या खोया और क्या पाया हूं
क्या मिला है मुझको और क्या क्या मैं छोड़ आया हूं
कुछ मन मॆं दबी दबी सी चाहतें रही होंगी
तालीम के बहाने ही सही, शायद अपना घर छोड़ आया हूं
अब तो सारे व्यंजन ही बेस्वाद लगते हैं
घर मैं खाने पर इंतजार करती मॉं छोड़ आया हूं
आ जाती है चमक जिन ऑंखों में मेरा जिक्र आने पर
बाप की उन ऑंखों में लंबे इंतजार का दर्द छोड़ आया हूं
होली के रंग में ठिठोली तो बहुत हुयी होगी
मगर साड़ी के धानी होने का भाभी का सपना तोड़ आया हूं
तोहफे में दिया कुर्ता पहनकर कर लेता हूं हसरतें पूरी
वर्ना शायद दूज.की रोली और राखी का बंधन छोड़ आया हूं
यहाँ बिस्तर भी नरम और नरम तकिया मेरा
मगर अंजान सपनों की चाहत में नींदें छोड़ आया हूं
गलियां ही गलियां हैं मगर घर जाने वाली गली नहीं मिलती
शायद मैं खुद ही उस गली का मुंह मोड़ आया हूं
और अब कितनी सुनाऊं दास्तान, ठीक से इबारत नहीं मिलती
वो जिन्दगी बयां करने वाली सारी किताबें वहीं छोड़ आया हूं।
