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Suyash dixit

Abstract

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Suyash dixit

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जीवन और मृत्यू

जीवन और मृत्यू

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तुम बनाओ पैसों का पहाड़, वो तोड़ देगी।

ज़िन्दगी ऐसी चीज, न जाने कब साथ छोड़ देगी।


जी लो अपना हर पल, दुनिया बहुत हसीन है

न जाने, उधर की दुनिया, भी क्या इतनी ही रंगीन है

इसको गिराया उसको गिराया, इसको ठगा उसको छला, 

बस पूछता हूं एक सवाल -क्या तुम्हे, कभी सुकूँ मिला। 


मरने के बाद चहेते तो सब बन जाते है

असली योद्धा वो, जो जीते जी कुछ कर जाते है।

नहीं सुना होगा कभी, कि आदमी बुरा था

क्योंकि अपनी मौत सोच सब डर जाते है।


ज़िन्दगी चार दिन की ही हो, मगर उदहारणत्मक हो, 

न क्षण उसमे एक भी नकारात्मक हो।

कुछ ज़िन्दगी जाया करते, पर जी तो सब जाया करते 

पर कुछ ही बिरले होते हैं जो इतिहास बनाया करते है।


वैसे तो न जाने रोज लाखों मरते हैं 

पर कुछ मरकर, भी कभी नहीं मरते।


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