ज़हर
ज़हर
अरे विषधरों अपना ज़हर छोड़ दो ,
गर नावतन समझ लिया तो शहर छोड़ दो।
देश का नमक खाया तो नमक हलाल बनो,
विश्वनाथ काशी का महाकाल बनो।
अपना सब यहीं है दूरियाँ क्यों बढ़ाते हो,
जो वक्त पर नहीं तो छुरियां क्यों चलाते हो।
मंजिल पाना है जल्द तो डगर मोड़ दो,
गर नावतन समझ लिया तो शहर छोड़ दो।
अपना वतन अपना चमन समझ लिया जो दिल से,
केवड़ा केतकी रातरानी बन महक दिया जो खिल के।
ये पावन धरा है जहां राम कृष्ण जनम लिये,
कबीर बुद्ध की धरती है जहां अलौकिक करम किये।
ऊंच नीच और जातिभेद का कमर तोड़ दो,
गर नावतन समझ लिया तो शहर छोड़ दो।
ये मीरा तुलसी दुर्गा लक्ष्मी सूर जयदेव का देश है,
जहां की अनेकों बोली भाषा और वेष है।
अनेकता में एकता यहाँ की सुन्दर रीत है,
आपसी भाईचारा और प्रेम की सच्ची प्रीत है।
बंधुत्व स्वीकार है तो कहर छोड़ दो,
अरे विषधरों अपना ज़हर छोड़ दो।
