STORYMIRROR

Mohit Jagne

Abstract

4  

Mohit Jagne

Abstract

एक जमाना !

एक जमाना !

1 min
532

एक जमाना था

जहाँ ना कुछ कमाना था

ना कुछ गँवाना था


ना बीते क़ल का ग़म

ना आनेवाले कल की फिकर

बस आज में खुश थे होके बेखबर


कोई नृत्यकार तो कोई संगीतकार

उस जमाने में था हर कोई कलाकार

किसी के हाथ पैर नहीं रुकते थे तो

किसी की आवाज़

सुपरमैन, स्पाइडरमैंन ही नहीं

वहा हर कोई था जांबाज


उस जमाने में थे सवाल कई

पर आज ऊन सवालों के जवाब ही नहीं

मुझे लगाव है उस जमाने से जहां

ना थी किसी चीज की कमी

मुझे लगाव है उस पल से भी

जब उस जमाने को याद करके

आती हैं आंखों में नमी


खुश नसीब है वो लोग जो उस जमाने से ही

माँ बाप के साथ होकर भी मजबूर है

बदनसीबों में होती है हमारी भी गिनती

क्यों की उस जमाने से ही माँ बाप से दूर है


शुक्र है इसी बहाने माँ बाप की

जल्दी याद तो नहीं आती

पर याद आती है उस जमाने की जहां

माँ बाप का प्यार

मिला हर बार

वो भी जितना चाहो उतनी बार !

तो क्या मैं उस जमाने को

बचपन कह सकता हूं ?


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Mohit Jagne

Similar hindi poem from Abstract