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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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चौपाई छंद

चौपाई छंद

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चौपाई छंद कभी-कभी ऐसा कुछ होता। मानव उसको जबरन ढोता।। पर ऐसा अवसर भी आता। खुशियों का अम्बर पा जाता।। मान समय का जो भी रखता। मीठे फल वो निशदिन चखता।। समझे पल की जो मर्यादा। वह पाता है हक से ज्यादा।। समय साथ हरदम कब देता। आप परीक्षा भी तो लेता।। धैर्य कभी अपना मत खोना। बिलख व्यर्थ मत रोना-धोना।। आज हुआ है पैसा भारी। हुई दूर सब रिश्तेदारी।। सोचो अब हमको क्या करना। किससे कितना रिश्ता रखना।। मित्र एक यमराज हमारे। लगते सबसे हमको प्यारे।। मन करता तब ही आ जाते। लड़े बिना सूकून न पाते।। चाय पिए बिन कहीं न जाते। खाते -पीते रंग जमाते।। इधर-उधर की बातें करते। पर बीबी जी से वो डरते।। गर्मी की आई फिर बारी। व्यर्थ हुई सारी तैयारी।। ताल-तलैया सूख रहे हैं। पशु-पक्षी भी तड़प रहे हैं।। कोस रहा अपने को मानव। कहता हमसे अच्छे दानव।। गर्मी के हम सब दोषी हैं। सबने मिलकर ही पोसी है।। कंकड़ पत्थर बाग लगाए। धरती को वीरान बनाए।। भोग रहे कर्मों को अपने। नाहक देखे इतने सपने।। सुधीर श्रीवास्तव 


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