STORYMIRROR

Kumar KGR

Abstract

4  

Kumar KGR

Abstract

भटकते ख़त

भटकते ख़त

1 min
444


जब ज़िंदगी के उजालों को,

नाउम्मीदी के अंधेरे निगल जाएं,

तो ख़ून के आंसू,

जो ज़ख्मों से रिस कर

आंखों से बहते हैं,

रोज़ लिखते हैं एक अफ़साना,

तकिए के गिलाफ़ पर,

और दफ़न हो जाते हैं,

सहारा के रेत सी 

कपा‌स की परतों में,

इन ख़तों का शायद 

यही पता मुक़र्रर है।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract