मार्गदर्शक - दूसरी माँ
मार्गदर्शक - दूसरी माँ
मैं था एक अजनबी जब इस शहर में आया,
क्या सही और क्या गलत, मैं समझ नहीं पाया।
भटकाव इतने थे कि मैं संभल भी नहीं पाया।
पर इतना तो ज़रूर था, मैं सीख भी पाया।
साल तो ऐसे निकला जैसे कुछ पता ही नहीं,
डगमगाते अपने कदमों को, मैं करना चाहता था सही।
कोई नहीं लगा था मुझ को अपना इस भीड़ में,
पर वो दिन भी आया, जब किसी की बातें उतरी दिल में।
मेरे सभी बढ़ते हुए कदमों को नई चाल मिल रही थी,
मैं जब भी था मुश्किलों में, वो हिम्मत देने को खड़ी थी।
वो है तो मेरी गुरु, लेकिन मुझे मेरी माँ लगती है,
वो खुद से भी ज्यादा हम बच्चों का सोचती है ।
वो चाहती यही हमेशा, कोई हमें नुकसान ना पहुँचाए,
उनके रहते हुए हम विद्यार्थियों पर कोई आंच ना आए।
गुरु मिले सबको ऐसा, यही ऊपरवाले से है मेरी फ़रमान,
हम बच्चों की सफलता ही है उनकी शान और मुस्कान।
कितना और लिखूं मैं मेरी माँ समान गुरु के बारे में ,
नहीं वर्णन कर सकता चाहे पिरो लूं मैं शब्द कई।
नाम तो मेरी माँ का है, योगदान भी कोई कम नहीं ,
मैं एक माँ से दूर आया, मुझे दूसरी माँ मिल गई।।
