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Animesh Bajpai

Thriller

4  

Animesh Bajpai

Thriller

जासूस जय

जासूस जय

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 सारे मुंबई शहर में जासूस जय की काफी चर्चा थी। राज्य स्तर के कुछ बड़े आपराधिक मामलों को सुलझा लेने के बाद अब लोग कहने लगे थे कि वह तीक्ष्ण बुद्धि का, चुस्त एवं विलक्षण युवक है। अखबारों में भी प्रायः उसके बारे में कुछ न कुछ छपता ही रहता था।


अतः जय ने महाविद्यालय की शिक्षा के साथ-साथ ही बतौर प्राइवेट जासूस अपनी प्रैक्टिस आरंभ कर दी थी। उसने अपने जंगले के सामने वाले हिस्से में बाकायदा एक दफ्तर भी बना लिया था। जहां पर मुसीबत में फंसे लोग उससे सहायता लेने आते थे।


फिलहाल ‘दनलोप बियरिंग कंपनी‘ के मैनेजिंग डाइरेक्टर म. कुमार आधे घंटे से उसके दफ्तर में बैठे उसका इंतजार कर रहे थे।


उनसे मिलने के लिए जय भी कम्युनिटी सेंटर में चल रहे पुलिस समारोह को छोड़ कर आया था। जय को सूचना मिली थी कि म. कुमार को उस से बहुत जरूरी काम है।


जय ने अपनी मोटर साइकिल दफ्तर के बरामदे में खड़ी की। सामने ही म. कुमार की कार खड़ी थी। गाड़ी के बगल से गुजरते हुए जय अपने दफ्तर में पहुंचा। कुमार साहब सोफे पर न बैठ कर बेसब्री से उसके दफ्तर में टहल रहे थे। जय को देख कर वह उसकी ओर लपके।


दफ्तर में घुसते ही जय बिना किसी औपचारिकता के बोला, “बताइए कुमार साहब, क्या जरूरी काम आ गया है? मुझे कम्युनिटी सेंटर में आप का सेक्रेटरी बुलाने गया था।”


“बेटा, मुझे दुख है कि मैंने तुम्हें अचानक ही तकलीफ दी। मैं 2 घंटे बाद ही विमान से एक सप्ताह के लिए अमेरिका जा रहा हूं। उससे पहले मैं तुम्हें एक महत्त्वपूर्ण केस देना चाहता हूं। हमारी कंपनी विभिन्न मशीनों में लगने वाले एक खास किस्म के बियरिंग बनाती है। ये बियरिंग बहुत महंगे होते हैं। पिछले चोर का पता लगा पाने में असफल रही है। बेटे, तुम इस केस को अपने हाथ में ले लो। मैं तुम्हें मुंह मांगी फीस दूंगा।”


“आप सिर्फ एक हजार रुपए अग्रिम तौर पर खर्चे के लिए दे दीजिए। आप का केस सुलझ जाने के बाद आप अपनी मरजी से जो इनाम देंगे, मैं ले लूंगा,” जय ने कहा।


“मंजूर है, तुम शाम को 4 बजे हमारी फैक्टरी में आ कर हमारे जनरल मैनेजर रंजीत से मिल लेना। मेरे अमेरिका जाने के बाद वही तुम्हारी मदद करेंगे।”

“मुझे पूरी आशा है कुमार साहब, कि आप के अमेरिका से लौटने पर मैं बियरिंग के चोर को आपके सामने खड़ा कर सकूंगा।”


“धन्यवाद जय, मुझे तुम से यही उम्मीद थी। अब मैं चलता हूं।” कह कर म.कुमार चले गए।


निर्धारित समय पर जय दनलोप बियरिंग कंपनी में रंजीत से मिला। उन्होंने उसका भरपूर स्वागत किया। बातों के दौरान जय ने पूछा, “आप के बियरिंग गायब कैसे जाते हैं? कृपया पूरी बात बताने का कष्ट करें।”


रंजीत ने बताया, “हमारे यहां उत्पादन विभाग में बियरिंग बनने के बाद उन्हें ट्राली में भर कर स्टोर में ले जाया जाता है। वहां बियरिंग गिन कर स्टोर विभाग को सौंप दिए जाते हैं।”


“बना हुआ माल अगले दिन आर्डर के मुताबिक विभिन्न कंपनियों को, स्टोर से निकाल कर भेजा जाता है। आर्डर की परची दिखाने पर स्टोर वाले कर्मचारी वह माल डिस्पैच विभाग को सौंपते हैं। डिस्पैच विभाग से माल आर्डर के अनुसार पेटियों में भर कर फैक्टरी से बाहर जाता है।”


“बियरिंग की चोरी किस स्थान से हो रही है?” जय ने पूछा।


“करीब 2 महीने पहले स्टोर विभाग के मैनेजर एस. शर्मा ने आ कर मुझसे शिकायत की थी कि स्टाफ से 260 बियरिंग गायब हैं। उन्होंने यह भी बताया कि स्टोर में काम करने वाले सभी आदमी ईमानदार एवं पुराने हैं। अतः मैंने उनको सलाह दी कि अपना रजिस्टर चेक करो और बियरिंग स्टोर में ढूंढ़ो।


“मेरी सलाह पर इस कार्य को पूरा करने में उन्हें पूरा एक सप्ताह लग गया। तब पता चला कि उन 7 दिनों के भीतर फिर 40 बियरिंग गायब हो गए। इस समाचार से हम लोगों को आघात लगा। लेकिन उसके बाद 15 दिनों तक बियरिंग गायब नहीं हुए। 15 दिन के बाद फिर से मैंने उनको स्टाफ चेक करने के लिए कहा। चेकिंग के बाद मालूम पड़ा कि 70 बियरिंग फिर से गायब थे। तब तक हमारा धैर्य समाप्त हो चूका था। अतः हमने इसकी रिपोर्ट पुलिस में की।


“पुलिस वाले डंडे लेकर फैक्टरी में घूमते रहे, चीखे चिल्लाए भी। उसके बाद पूछताछ करके स्टोर के 2 आदमियों को पकड़ कर थाने ले गए। थाने में उन्हें मारा पीटा। 3 दिन हवालात में बंद रखा। बाद में बिना किसी लिखा पढ़ी के उन लोगों को छोड़ दिया।”


रंजीत ने अपनी कहानी जारी रखी, “जय, बात इतनी आगे बढ़ जाने के बाद भी चोरी का सिलसिला बंद नहीं हुआ। पिछले दिनों 2 बार स्टाफ रिपोर्ट लेने पर पता चला कि पहली बार 60 और दूसरी बार 50 बियरिंग फिर गायब हो गए। पुलिस वाले हर सप्ताह फैक्टरी में आकर चिखचिल्ला कर हम से अपना खर्चा पानी ले जाते हैं। चोरी का पता तो वे लोग लगा नहीं पाते बल्कि हमारे स्टोर के कर्मचारियों से पूछताछ करते रहते हैं। इससे हमारे कर्मचारियों में दहशत बैठ गई है। हमारे कर्मचारी कंपनी प्रबंधकों को जलीकटी सुनाते रहते हैं। वे समझते हैं कि कंपनी प्रबंधक पुलिस साथ सांठगांठ करके निर्दोष लोगों की पिटाई कराते हैं। हमारा पुलिस पर अब विश्वास नहीं रहा।

जय, अब आप ही चोर को पकड़ हमारी मदद हैं।”


“चोर बहुत ही चालाक मालूम पड़ता है, रंजीत साहब। लेकिन आप फिक्र न करें, मेरी निगाहों से बच कर वह नहीं सकता। आप मुझे अपना स्टोर दिखाइए,” जय ने कहा।


रंजीत जय को लेकर स्टोर में गए। उनके दफ्तर से स्टोर की दूरी लगभग 100 गज की थी। यह एक बहुत बड़ा स्टोर था। इसे गोदाम भी कहा जा सकता था। स्टोर के भीतर तरह तरह के शेल्फ थे, जिन में प्लास्टिक की बड़ी बड़ी रंगीन ट्रे रखी हुई थीं। ट्रे में विभिन्न साइज के बियरिंग भरे हुए थे।


स्टोर की छत काफी ऊंची थी। काफी ऊंचाई पर 2 छोटे छोटे रोशनदान बने हुए थे जिस वजह से ट्यूबलाइट जला कर ही स्टोर में रोशनी की जा सकती थी। 3 तरफ बंद दीवारें थीं और चौथी तरफ एक बड़ा सा लोहे का दरवाजा आने जाने के लिए था। दरवाजे के बाजू में और खिड़की थी। खिड़की के 2 दरवाजे लोहे की ग्रिल के बने थे।


खिड़की से नीचे काउंटर बना हुआ था।


स्टोर के बाहर बड़ा सा बरामदा था। बरामदे में 8 – 9 मेजें और कुरसियां थीं जिन पर स्टोर विभाग के कर्मचारी काम करते थे। यह बरामदा लोहे की ग्रिल से घिरा हुआ था। ऊपर छत थी, नीचे गोदरेज की अलमारियां कतारों में रखी थीं। अलमारियों के सामने एक ओर स्टोर के मैनेजर एस.शर्मा की मेज कुरसी रखी हुई थी। वह वहीं पर बैठे हुए थे।


रंजीत ने एस.शर्मा से जय का परिचय कराया। औपचारिकता पूरी होने के बाद जय ने पूछा, “शर्मा साहब, क्या आपको अपने विभाग के किसी कर्मचारी पर शक है?”


“नहीं साहब, मुझे अपने विभाग के किसी कर्मचारी पर शक नहीं है क्योंकि हमारे विभाग के सभी कर्मचारी पिछले 10 वर्षों से भी अधिक समय से यहां पर कार्यरत हैं। किसी का भी पिछला रिकार्ड खराब नहीं है,” एस.शर्मा ने कहा।


“आप के विभाग में कितने कर्मचारी काम करते हैं?”


“जी, चपरासी को मिला कर कुल 10 व्यक्ति काम करते हैं।”


“क्या आप को भी मिला कर?”


“जी हां।”


“आपको और चपरासी को छोड़ कर शेष 8 आदमी क्या करते हैं?”


“हमारे यहां एक सुपरवाइजर, 4 रिकार्ड रखने वाले क्लर्क, 2 टेलीक्लर्क और एक हेल्पर है।”


“इनके क्या क्या कार्य हैं?”


“स्टोर के माल का हिसाब, रेकार्ड क्लर्क किताबों में रखते हैं। एक टेलीक्लर्क उत्पादन विभाग से आए माल को गिन कर स्वीकार करता है, दूसरा टेलीक्लर्क स्टोर के भीतर वाले माल को बाहर भेजने से पहले गिनता है। वह खिड़की वाले काउंटर पर बैठता है। हेल्पर का काम भीतर से माल निकालना और रखना होता है।”


“क्या आप मुझे स्टोर के भीतर खिड़की वाले काउंटर पर बैठने वाले टेलीक्लर्क से मिलवा सकते हैं?” जय ने एस.शर्मा से पूछा।


“अभी 5 मिनट बाद मिलवाता हूं, वह डिस्पैच विभाग तक गया है।”


“ठीक है, तब तक मैं स्टोर विभाग के दरवाजे और खिड़की को चेक कर लेता हूं,” जय ने कहा।


जय ने स्टोर का दरवाजा देखा। वह लोहे का मजबूत दरवाजा था। उसमें बाहर की और से एक मोटा सा कुंडा लगा था। जिस खिड़की से बियरिंग सप्लाई किए जाते थे, उस खिड़की के नीचे एक काउंटर बना था। खिड़की में 2 दरवाजे थे जो लोहे की ग्रिल से बने थे। ग्रिल के दरवाजों पर फूल वाला डिजाइन बना था। खिड़की के दरवाजों पर काले रंग का पेंट लगा हुआ था।


जय बारीकी से मुआयना कर रहा था कि तभी खिड़की के काउंटर पर बैठने वाला क्लर्क डिस्पैच विभाग से लौट आया। जय ने उसे ऊपर से लेकर नीचे तक देखा। पैंट, शर्ट और जूते मोजे पहने वह आकर्षक सा दुबला पतला गौर वर्ण का युवक था। उसकी उम्र लगभग 30 वर्ष की होगी। एस.शर्मा ने उससे जय का परिचय करवाया।


जय ने उससे पूछताछ शुरू की, “आप का नाम?”


“राघव।”


“आप इस कंपनी में कब से काम कर रहे हैं?”


“कंपनी में काम करते हुए तो 10 वर्ष हो गए हैं किंतु इस खिड़की पर 3 वर्ष से कार्यरत हूं।


“स्टोर के दरवाजे और खिड़की पर ताला कब लगता है?”


“शाम को 6 बजे, हमारी छुट्टी के बाद लगता है। ताले पर कागज की हस्ताक्षर युक्त सील भी लगाई जाती है।”


“कौन करता है यह सब काम?”


“मैं ताला लगा कर स्वयं के दस्तखत वाली सील लगाता हूं। उसके पश्चात सुरक्षा अधिकारी राजेंद्र को चाबी सौंप देता हूं।”


“जरा सोच कर बताइए कि आप रोज स्वयं ताला लगाते हैं या कभी किसी दूसरे से भी ताला लगवाते हैं।”


सील तो मैं स्वयं चिपकाता हूं लेकिन ताला कभी कभी हमारे विभाग का चपरासी दयाराम भी लगा देता है।”


“कभी कभी लगाता है या कुछ दिनों से यह लगातार ताला लगा रहा है?” जय ने जानबूझ कर जाल फेंका।


“क्या मतलब है आप का?” राघव चौंका, फिर बोला, “दया राम बहुत ईमानदार व्यक्ति है। वह इस कंपनी में पिछले 25 वर्षों से काम कर रहा है।”


“आप सही हो सकते हैं लेकिन मेरी बात का जवाब दें। क्या वह पिछले कुछ महीनों से ताला लगाने का कार्य नहीं कर रहा है?”


“जी हां, आप की यह बात ठीक है।”


“धन्यवाद राघव जी, अब मुझे आप से कुछ नहीं पूछना है।”


इसके बाद जय ने एस.शर्मा से कहा, “शर्मा साहब, जरा मुझे दया राम से मिलवाइए।”

एस.शर्मा के आदेश पर दया राम उपस्थित हो गया। जय ने दया राम से पूछा, “दया रामजी, क्या आप स्टोर की खिड़की और दरवाजे पर ताला स्वयं लगाते हैं?”


“जी हां, मैं शाम को स्वयं ताला लगाता हूं और सुबह 8.00 बजे साहब लोगों की उपस्थिति में ताला खोलता हूं।”


“ताला बंद करने के बाद सील कौन लगाता है?”


“सील तो राघव जी ही लगाते हैं।”


“छुट्टी के बाद तुम राघव जी के साथ बाहर जाते हो या उनके बाद देरी से जाते हो?”


“हम लोग साथ साथ ही फैक्टरी गेट से बाहर निकलते हैं और साथ साथ ही घर जाते हैं।”


ऐसा क्यों?”


“हम दोनों एक ही कालोनी में रहते हैं, सुमन कालोनी में।”


“आप राघव के घर भी जाते होंगे। उनके घर का छोटा मोटा काम भी करते होंगे?”


दया राम चुप रहा। कोई जवाब नहीं दिया।


“अच्छा, यह बताओ खिड़की पर लगने वाले ताले नए हैं या पुराने?”


“दरवाजे का ताला नया है और खिड़की का पुराना।”


“ये ताले किस ने खरीदे थे?”


“दरवाजे का ताला तो मैं ही बाजार से खरीद कर लाया था लेकिन खिड़की का ताला कंपनी का ही है।”


“इस कंपनी में किसी के साथ आप की कोई दुश्मनी तो नहीं है?”


“जी नहीं।”


“अच्छा दया राम, तुम यहां के पुराने कर्मचारी हो इसलिए मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। ऐसे ही मेहनत और लगन से काम किया करो,” जय ने दया राम की पीठ थपथपाई।


इसके बाद जय कंपनी के जनरल मैनेजर की ओर मुड़ा और बोला, “अच्छा रंजीत, अब मुझे इजाजत दीजिए। इस चोरी का पता लगाना इतना आसान काम नहीं है। मैं आप का यह केस छोड़ रहा हूं। इसे पूरा करना मेरे बूते का काम नहीं हैं। आप अपना एडवांस मेरे दफ्तर से वापस ले लें।”


फिर सब को आश्चर्य में छोड़ कर जय वहां से चला गया। किसी को इसकी उम्मीद न थी।


रंजीत बड़बड़ाए “अजीब आदमी हैं।”


एस.शर्मा ने भी आश्चर्य से अपने कंधे उचकाए। शेष कर्मचारी भी आश्चर्यचकित होते हुए अपने अपने काम के स्थान पर लौट गए।


कुछ दिन बाद की बात है। रात के 10 बज चुके थे। दिन भर व्यस्त रहने के कारण जय थक गया था। वह सोने जा रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बज उठी।


“इस समय कौन हो सकता है?” जय ने फोन को घूरते हुए रिसीवर उठाया, “हैलो।”


“मैं म.कुमार बोल रहा हूं,” उधर से आवाज आई।


“पहचान लिया कुमार साहब। कहिए, कैसे फोन किया?”

 “2 घंटे पहले ही अमेरिका से लौटा हूं। जय जी, मुझे पता चला है कि आप ने हमारा केस सुलझाने से मना कर दिया है, अग्रिम राशि भी लौटा दी है। यह तो आप ने विश्वास तोड़ने का काम किया है। आखिर क्या वजह है?”

“नहीं…नहीं…कुमार साहब, आप बुरा न मानिए। मैं कल सुबह 8 बजे आप की फैक्टरी में आऊंगा। आप अपने क्षेत्र के थाने से पुलिस इंस्पेक्टर बलवंत सिंह को भी बुला लीजिए। मैंने चोर के बारे में 2 दिन पहले ही पता लगा लिया था। बस आप के अमेरिका से लौटने का इंतजार कर रहा था।”


“बहुत अच्छे, इसका मतलब यह हुआ कि आपने हमारी कंपनी के अफसरों को बेवकूफ बनाया। आखिर किस लिए, भाई?”


“चोर का पता लगाने के लिए यह ड्रामा जरूरी था, कुमार साहब। आप इसे मेरी मजबूरी समझ कर माफ करें।”


“बहुत अच्छे, तुम तो बड़े होशियार निकले।”


“तो फिर कल सुबह 8 बजे फैक्टरी में आप के कक्ष में मिलते हैं,” कहते हुए जय ने फोन का रिसीवर रख दिया।


इधर कंपनी के मालिक म. कुमार आश्चर्यचकित थे। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्होंने सारी रात उत्सुकता में करवटें बदल कर काटी। वह सोच रहे थे कि चोर आखिर कौन हो सकता है? राकेश ने इतनी जल्दी चोर का पता कैसे लगा लिया?


वह सुबह जल्दी ही सो कर उठ गए और तैयार हो कर फैक्टरी पहुंचे। उन्होंने रंजीत को भेज कर पुलिस इंस्पेक्टर बलवंत सिंह को अपने कक्ष में बुलवा लिया।


जय सुबह के ठीक 8 बजे कुमार साहब के कक्ष में पहुंच गया। उसे प्रसन्नता हुई कि वहां पर कुमार साहब, पुलिस इंस्पेक्टर बलवंत सिंह और जनरल मैनेजर रंजीत मौजूद थे।


जय ने कहा, “सेठजी, आप स्टोर विभाग के सारे कर्मचारियों को यहां बुला लें। उनके सामने ही चोर को पकड़ना ज्यादा अच्छा होगा।”


कुमार साहब ने रंजीत की ओर देखा, रंजीत ने कहा “हां” कह कर गरदन हिलाई और चपरासी को बुला कर आदेश दे दिया। कुछ ही देर में वहां पर स्टोर विभाग के सारे कर्मचारी इकट्ठे हो गए।


जय ने कहा, “अब प्रोडक्शन विभाग से सुरेंद्र राठी को भी बुला लें” चपरासी फिर से जा कर प्रोडक्शन विभाग से सुरेंद्र राठी को भी बुला लाया।


सुरेंद्र राठी के वहां आते ही इंस्पेक्टर बलवंत सिंह चौंके। उनके मुंह से एकदम निकल पड़ा। “यह तो सजायाफ्ता चोर है। आप के यहां कैसे आ गया?”


सुरेंद्र राठी ने इंस्पेक्टर के मुंह से यह सुना तो वहां से भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस इंस्पेक्टर बलवंत सिंह ने बड़ी फुरती से उसे पकड़ लिया और उसके हाथों में हथकड़ी लगी दी।


जय ने कहा, “सुरेंद्र राठी का चोरी में पूरा पूरा साथ देने के जुर्म में आप दया राम को भी गिरफ्तार कर लीजिए, इंस्पेक्टर साहब।”


“यह मेरे ऊपर झूठा आरोप है। मैं इस कंपनी का पिछले 30 वर्षों से वफादार नौकर हूं। पिछले सप्ताह तो जय जी ने सब के सामने मेरी पीठ थपथपाई थी। आज यहां स्वयं मुझे गिरफ्तार करने के लिए कह रहें हैं,” दया राम चिल्लाया।


“आप दिन दहाड़े किसी शरीफ आदमी की इज्जत धूल में नहीं मिला सकते,” स्टोर मैनेजर एस.शर्मा भी चीख पड़े। स्टोर विभाग के दूसरे कर्मचारी भी शोर मचाने लगे।


कुमार साहब ने उन लोगों को शांत किया और जय से बोले, “आप इन लोगों की उत्सुकता को शांत करके जरा केस पर ठीक ढंग से रोशनी डालिए। आप शायद ठीक कह रहे हों, लेकिन मुझे भी कंपनी चलाने के लिए इन लोगों से ही काम लेना है।”


“ठीक है, अब आप लोग मेरी बातें जरा ध्यान से सुनिए,” जय ने आराम से कहना शुरू किया, “आज के युग में स्वयं के बारे में ईमानदार एवं शरीफ होने का दावा करना सूरज को दीपक दिखाने के समान है, क्योंकि प्रत्येक आदमी के जीवन में कभी न कभी, किसी न किसी रूप से लालच में फंस ही जाता है। मसलन दया राम पर राघव पूरा पूरा भरोसा इसलिए करते हैं क्योंकि वह दफ्तर में और दफ्तर के टाइम के बाद घर पर भी उनकी सेवा करता है। वह पिछले 25 वर्षों से कंपनी में निष्ठापूर्वक काम कर रहा है, लेकिन बुरा हो लालच का, 25 वर्षों के बाद भी वह लालच में फंस ही गया।

“सुरेंद्र राठी एक पेशेवर चोर है। उसने दया राम को विश्वास में लिया और दया राम को अपना झूठा परिचय देकर गांव की रिश्तेदारी निकाल ली। इसके बाद दया राम की सिफारिश से इस फैक्टरी में नौकरी पर लग गया। फिर उसने दया राम को उपहार दे दे कर लालची बना दिया। लालच ने दया राम जैसे आदमी को अंधा कर दिया। वह सुरेंद्र राठी का प्रत्येक कहना मानने लगा। दोनों साथ में खाने पिने लगे और देर रात तक गपशप करने लगे।

“सुरेंदर राठी के उकसाने पर ही दोनों ने मिल कर एक योजना बनाई। 3 महीने पहले स्टोर के लिए 2 ताले खरीदने का आदेश प्राप्त हुआ तो दया राम ने एक ताला खिड़की में लगा दिया जो चाबी लगाने से प्रत्यक्ष में तो बंद हो जाता था लेकिन हाथ से झटका देते ही खुल भी जाता था। इस ताले को हाथ से धक्का देकर फिर से बंद भी किया जा सकता था।


दया राम ने हाथ आए इस अवसर के बारे में अपने प्रगाढ़ मित्र सुरेंद्र राठी को बताया। सुरेंद्र राठी की बाछें खिल गई। उसका तेजतर्रार पेशेवर दिमाग काम करने लगा। आपस के विचार विमर्श से उनकी योजना को बल मिला जबकि दया राम का बास राघव उसकी इस चालाकी के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकता था।”


जय ने बोलना जारी रखा, “लेकिन मैं दया राम की इस चालाकी को पिछले दिनों खिड़की का मुआयना करने के बाद भांप गया था, अतः मैं उसे सतर्क नहीं करना चाहता था।


“इसके बाद मैंने चुपके से रंजीत जी से उनके घर पर संपर्क साधा। उनसे कुछ मदद चाही और अपने मकसद को गोपनीय रखने के लिए कहा। यहां तक कि कुमार साहब से भी छिपा कर रखने का वादा लिया।


“दया राम को सतर्क होने से बचा कर और प्रत्यक्ष में स्टोर विभाग से लौट कर मैंने चोर को पकड़ने के लिए जाल बिछाया था। उसके बाद मैं रंजीतजी के साथ रात में 9 बजे चुपके से फैक्टरी में घुसा। मैंने स्टोर में जाकर खिड़की की ग्रिल पर काले रंग का ताजा पेंट लगाया। मुझे आशा थी कि उस रात को कोई न कोई चोर खिड़की के रास्ते बियरिंग चुराने आएगा। खिड़की पर पहले से ही काला रंग लगा हुआ था, इसलिए चोर को संदेह भी नहीं हो सकता था कि ताजा पेंट किया गया है। इसके बाद मैं निश्चिन्त हो गया, लेकिन उस रात कोई चोरी नहीं हुई।


“मैंने दूसरी रात को फिर ताजा पेंट खिड़की में लगाया। सुरेंद्र राठी रात में 12 बजे अपनी ड्यूटी पर तीसरी पारी में आया। इसके बाद अवसर मिलते ही वह स्टोर में गया। फिर उसने खिड़की की ग्रिल में हाथ डाल कर ताला खोला भीतर घुस गया।


“उसे पता भी न चला कि उसके हाथ में काला पेंट लग गया था। मैंने पेंट में एक केमिकल मिलाया था जिस की वजह से पेंट हाथ में लगने के बाद आसानी छूट न सके।


एस.शर्मा जी, आप एक बात ध्यान से सुनिए। आप के यहां जब भी चोरी होती थी, उस रात सुरेंद्र राठी तीसरी पारी की ड्यूटी में होता था। आप को स्टोर स्टाफ रजिस्टर तथा सुरेंद्र राठी का हाजिरी रजिस्टर देखने से इसका पता चल जाएगा। थोड़े से बियरिंग चोरी करने के बाद सुरेंद्र राठी खिड़की में दया राम द्वारा बताई गई तरकीब के अनुसार ताला बंद कर देता था। इससे ताले की सील भी वैसी की वैसी लगी रहती थी। इसके बाद वह बियरिंग लेकर फैक्टरी की पिछली चारदीवारी की ओर चला जाता।


“रात में एक से डेढ़ बजे के बीच वहां पर कोई चौकीदार नहीं होता है क्योंकि एक बजे रात तक ड्यूटी करने वाला चौकीदार अपनी छुट्टी करके सिक्योरिटी गेट ऑफिस में चला जाता है और वहां पर सोए दूसरे चौकीदार को उठा कर अपने स्थान पर भेजता है। इस बीच आधे घंटे तक वहां सुनसान रहता है। इस स्थिति का फायदा उठा कर सुरेंद्र राठी बियरिंग चारदीवारी के बाहर फेंक देता था जिन्हें सुबह 5 बजे दया राम आ कर उठा लेता था।


“मैंने 2 -3 दिन दया राम के घर पर अपने एक सहायक द्वारा निगरानी करवाई, तब यह रहस्य मेरे सामने आया।


“पिछले बुधवार की रात को चोरी करने के बाद सुरेंद्र राठी को हाथ में लगे काले पेंट के बारे में पता नहीं चला। सुबह 8 बजे उसने ड्यूटी समाप्त करने पर काले रंग को हाथ पर लगा देखा तो घर जाने से पहले नल पर जाकर उस रंग को साफ करने का प्रयास किया। वह काला रंग उससे आधे तक भी नहीं छूटा। सुबह की ड्यूटी पर 7.45 बजे ही दया राम भी आ गया था। उसने सुरेंद्र राठी को मिट्टी के तेल की शीशी ला कर दी, पर उस तेल से भी उसके हाथ से पेंट का दाग नहीं छूटा।


“मैं चेहरे पर मेकअप करके नल के पास ही खड़ा था। मैं जानता था कि जिसके हाथ पर काले पेंट का दाग लगा होगा, वह नल पर आ कर हाथ का पेंट छुड़ाने की कोशिश करेगा।


“सुरेंद्र राठी को यह दाग छुड़ाते और दया राम द्वारा मिट्टी के तेल की शीशी लाने का दृश्य मैंने दूर से रंजीत जी को भी दिखाया था। अब तुम बताओ दया राम, तुमने लालच में आकर अपनी 25 साल की ईमानदारी पर दाग लगा दिया कि नहीं?”


दया राम सिर झुकाए खड़ा था। उसकी मौन स्वीकृति मिल जाने के कारण स्टोर विभाग के सभी कर्मचारी भी शोरगुल बंद करके मौन हो गए थे।


म. कुमार ने कहा, “इंस्पेक्टर साहब, आप इन दोनों चोरों को थाने ले जा सकते हैं।”


दया राम की आँखों में आंसू थे।


जय ने कहा, “सेठ जी, आप मेरी बकाया फीस न दीजिए। इसके बदले में क्या आप मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कर सकते हैं?”


“बोलो, जय।”


“सुरेंद्र राठी तो पेशेवर चोर है लेकिन दया राम जैसे ईमानदार आदमी से लंबे सेवा काल में यह पहली भूल हुई है। यदि आप इसे सरकारी गवाह बना कर जेल जाने से बचा लेंगे और बाद में वापस नौकरी पर रख लेंगे तो इसका शेष जीवन बरबाद होने से बच जाएगा।”


“ठीक है, तुम्हारे कहने से मैं इसे माफ कर दूंगा और तुम्हारी फीस भी दोगुनी दूंगा,” कहते हुए कुमार साहब ने जय की पीठ थपथपाई । सभी लोग यह देख बहुत प्रसन्न हुए। 


         

                                 । समाप्त ।


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