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Pooja Kumari

Abstract

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Pooja Kumari

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मंज़िल की चाह

मंज़िल की चाह

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जिंदगी टेड़ी मेडी सी लग रही है

ऐसा लग रहा है खुद से कह रही है


कि मिल जाएगी वो मंजिल जिंदगी,

जो तू ढूंढ रही है।


तरीके चाहे कितने भी हो वहां तक पहुंचने के

बद ज़िद ऐ है कि तुझे पहुंचना वहीं है, 


तुझे पहुंचना वहीं है

रास्तों के बीच रास्ते निकल आते हैं वैसे तो

पर वो पहला रास्ता ना जाने कहां है,

जो रास्ता तू ढूंढ रही है।


चलती हूं गिरती हूं, रुकती हूं उठती हूं

पुहंच जाऊंगी इस उम्मीद के साथ

क्यों कि पता है मुझे मंजिलें कभी

हिला नहीं करती अपनी जगह से


मंज़िल कल भी वहीं थी मंज़िल आज भी वहीं थी

जिंदगी कह रही है, जिंदगी कह रही है।


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