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Arun Bhaud

Inspirational

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Arun Bhaud

Inspirational

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा

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इस देश को अगर सीमाएँ नहीं होती।

तो क्या मेरे राष्ट्रभक्ति में वो जान नहीं होती।

इस देश का अगर बँटवारा न हुआ होता तो

आज लाहौर में भी हिंदुस्तानी आवाम बसी होती !


क्यों, केवल सीमाओं पे लड़ने वाला सिपाही ही,

इस देश की शान बनी होती।

अपने गोद मे बच्चा लेकर ड्युटी करने वाली महिला पुलिस,

क्या इस देश का अभिमान नहीं होती ?


कितनी सीमित हैं मेरी राष्ट्रभक्ति की परिभाषा।

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा।

क्या पाकिस्तान की नाम से मेरा खून खोंल उठे,

तभी मैं सच्चा हिंदोस्तानी ?

और किसीं पाकिस्तानी लड़के से निकाह करूँ

तो क्या में भी पाकिस्तानी ?


कितनी सीमित हैं मेरी राष्ट्रभक्ति की परिभाषा

मेरी मा को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा।

क्या माथेपर भगवा तिलक लगाने पर ही मैं सच्चा हिंदू ?

और क्या दाढी न बढाऊँ, तो में सच्चा मुसलमान नहीं ?

मैं अगर हिंदू, मुस्लिम, सिख या इसाई न होता...

तब भी क्या इस देश कीं मे एक संतान नहीं होता ?


कितनी सीमित हैं मेरी राष्ट्रभक्ति की परिभाषा

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा।

इस देश मे सिर्फ बम के धमाके करना ही राष्ट्रद्रोह हैं ?

और क्या मसुमोंपर बंदूक चलाने वाला ही केवल टेररिस्ट हैं ?


भ्रष्टाचारसे इस देश को खोखला करना क्या राष्ट्रद्रोह नहीं ?

क्या बंद कमरे में अपने बिवी पे हाथ उठानेवाला टेररिस्ट नहीं ?

कितनी सीमित हैं मेरी राष्ट्रभक्ति की परिभाषा

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा।


क्या नैतिकता और इंसानियत राष्ट्रभक्ति का परिमाण नहीं ?

अगर इस देश के बाहर रहूँ, तो क्या में इस देश का इंसान नहीं ?

क्या दिखावा ही राष्ट्रभक्ति है, और दिखावा करना जरूरी हैं ?


टीवी पे मेरा कोई इष्टेहार नहीं, तो क्या इस माँ के प्रति मेरे मन में प्यार नहीं ?

कितनी सीमित हैं मेरी राष्ट्रभक्ति की परिभाषा।

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा।

कुछ विलक्षण करने की नहीं हैं आशा, रखो भाईचारा,

और बोलो प्रेम की भाषा...बस इतनी सी उम्मीद करता हूँ,


हे भारतदेशा...सीमाओं के अंदर भी न बनाओ,

एक और द्वेष की रेस!

कितनी सीमित हैं मेरी राष्ट्रभक्ति की परिभाषा।

मेरी माँ को मुझसे हैं कुछ अलग ही आशा।


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