Kumar Vivek

Children


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शिक्षा का महत्व

शिक्षा का महत्व

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एक बार की बात है जब भारत वर्ष के बिहार प्रांत में रामपाल शर्मा नामक एक छोटा गरीब किसान निवास किया करता था l उसके परिवार में कुल 6 पुत्र, एक पुत्री पत्नी और उसकी बूढ़ी अम्मा भी l रामपाल और उसकी पत्नी सुरुचि देवी अपने पुत्र पुत्रियों को देखकर काफी प्रफुल्लित हुआ करते थे, परंतु दुर्भाग्य यह था कि वह अपने किसी भी बच्चे को शिक्षा देने में असमर्थ थे l वह इनके खाने और रहने की व्यवस्था करने में भी अपने आप को समर्थ नहीं पा रहे थे l उनका जो द्वितीय पुत्र था, उसका नाम विक्रम था, वह बचपन से ही काफी धैर्यवान और साहसी बालक था l वह पढ़ाई के प्रति जिज्ञासु था, परंतु वहां कभी विद्यालय नहीं जा पाता था, वह अपने पिता की भांति प्रतिदिन दूसरों के खेतों में मजदूरी करते ही अपना समय काट लेता था । उसी के साथ साथ उसके और पांच भाई भी मेहनती तो थे परंतु अशिक्षित थे, पर जो उसका बड़ा भाई था, उसका नाम विजय था, वह काफी कम उम्र में ही गलत आदतों के चुंगल में फंस चुका था । वह सदा ही अपने परिश्रम से धन तो कमा लेता था, परंतु उसका प्रयोग वह शराब पीने और जुआ खेलने में कर दिया करता था l इससे रामपाल काफी परेशान रहा करते थे l उन्हें सदा ही अपने बड़े पुत्र की चिंता सर्वाधिक रहा करती थी l परंतु विजय को इन सभी बातों से कभी कोई मतलब नहीं रहा करता था l पर जो द्वितीय पुत्र विक्रम था वह सदा ही अपने पिता और घर के बाकी सदस्यों के प्रति चिंतित रहता था l वह अपने मजदूरी से जो भी कमा कर लाता, उसे अपने पिता को दे देता था l

एक बार उसके गांव के सरकारी विद्यालय में गणतंत्र दिवस का आयोजन हुआ l उस समारोह में उसके जिला के जिलाधकारी उच्च विद्यालय में मुख्य अतिथि के रूप में आए हुए थे l सारे गांव वालों की नजर जिलाधिकारी महोदय पर ही थी lपर वह नादान बालक विक्रम यह समझ ही नहीं पा रहा था कि आखिर वह कौन है ? कारण यह था कि वह शिक्षा से कोसों दूर था l कुछ क्षणों के बाद संचालक ने यह घोषणा की कि अब हमारे जिला अधिकारी वहां से आए और हम सभी के बीच दो शब्द रखें l उसके बाद जिलाधिकारी ने मंच को संबोधित करते हुए कहा कि मेरे प्यारे ग्राम वासियों मैं आपकी समस्याओं को समझते हुए इस ग्राम एक उच्च विद्यालय और चिकित्सालय का निर्माण कराने की जल्द से जल्द पूर्ण प्रयास करूंगा और लगभग 20-25 मिनट तक भाषण देते रहें I परंतु विक्रम उनके पहले ही संबोधन और पंक्तियों से काफी प्रभावित हो चुका था, उसने जिलाधिकारी जी की बातों का मंथन करते हुए उसी दिन यह संकल्प किया कि आज से वह भी पढ़ाई करेगा और एक जिला अधिकारी बनकर लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करेगा l इसके उपरांत विक्रम ने स्वाग प्रेरित होते हुए लगभग 15 वर्ष की अवस्था में भी कक्षा आठवीं में अपना दाखिला अपने ही गांव के सरकारी विद्यालय में करवा लिया l उसने अपने घोर तपस्या और सफल होने की जिजीविषा से मैट्रिक और इंटर प्रथम श्रेणी से पास किया lउसकी पढ़ाई चल ही रही थी कि उसके पिता ने उसके बड़े भाई की शादी लगभग 18 वर्ष की अवस्था में ही अपने गांव के बगल वाले गांव के एक अनपढ़ लड़की से करवा दी l सभी ने सोचा कि यदि यह परिवार के बंधनों में बन जाएगा तो यह सुधर जाएगा, परंतु यह संभव न हो सका l वहां अपनी गलत आदतों से बाज नहीं आया l इधर विक्रम अपनी मेहनत और लगन से अपनी ग्रेजुएशन को भी पूरा कर लिया, परंतु लगभग 1 वर्ष ही बीते थे कि विजय को एक पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई, वाह इससे काफी खुश था l इससे उसके पूरे परिवार में खुशियों की लहर दौड़ उठी परंतु विधाता को उनकी खुशी देखी नहीं गई और उस बालिका को जन्म में अभी क्षमा ही हुए थे कि उसकी मां का आंचल उस बच्ची के सिर से छिन गया, उसकी मां टीवी से ग्रसित होकर परलोक सिधार गई l इससे विजय को भी काफी आघात हुआ l अपनी पत्नी के असमय मृत्यु के गम में वह धीरे-धीरे गलत आदतों के प्रति काफी तेजी से आकर्षित होता चला गया lइसके परिणाम स्वरुप वह लगभग 28 वर्ष की अवस्था में ही चल बसा l

पर विक्रम अपने घर की दूर विधा को देखते हुए अपने मेहनत को दिन दुगना रात चौगुना कर दिया l इसके बाद उसने यूपीएससी की परीक्षा दी, उसके परिणाम स्वरुप वह लगभग 26 वर्ष की आयु में ही एक जिलाधिकारी तो नहीं परंतु ब्लॉक में वीडियो के पद पर आसीन हुआ, परंतु उसे या रास नहीं आया l इसलिए उसने पुनः लोग प्रशासनिक सेवा में आवेदन करते हुए कड़ी मेहनत और कठोर लगन से दूसरे प्रयास में जिलाधिकारी बन अपने सपनों को आकार दिया l इससे उसने अपने समाज में हर एक गरीब बच्चे के लिए उदाहरण और प्रेरणा स्रोत बनने का सराहनीय कार्य किया l इसी के साथ साथ उसने अपने छोटे भाइयों की पढ़ाई में काफी मदद किया और उन्हें भी सुयोग्य नागरिक बनाने में काफी परिश्रम की l आगे चलकर उसने अपने वेतन से एक काफी अच्छा घर बनाया और उसे अपने पिता को भेंट किया l पर विजय के परिवार वालों ने उसकी बेटी सुलोचना को अपने ऊपर बोझ ना समझ कर उसे भी उच्चतम शिक्षा और अच्छा आचरण प्रदान कर एक शिक्षित परिवार में उसकी शादी करवा दी और सभी घरवाले प्रेम सौहार्द से एक दूसरे के साथ जिंदगी बिताने लगे और विक्रम ने अपनी कमाई से अपने गांव के उत्थान में काफी कुछ किया और अपने जीवन को प्रतिष्ठा के साथ जिया ll


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