Sarita Maurya

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पीली परी सी सुंदर कढ़ी

पीली परी सी सुंदर कढ़ी

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पश्चिमी राजस्थान में और विशेष कर पीले पत्थर से सजे जैसाणे में पीली यानी शुभ चीजों के महत्व में हल्दी और खाने में कढ़ी का विशेष महत्व है। सर्दियों में केसर युक्त दूध और जुकाम सर्दी होने पर हल्दीयुक्त कढ़ी दोनों ही स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। आइये हम सब कढ़ी के स्वाद से रूबरू होते हैं। तो चलें यात्रा पर!

जैसाणे के मौसम ने करवट बदली तो थोड़ा बहुत असर तो होना ही है। सर्दी़ की सरसराहट और दिन की तपिश ने थोड़ा अपना असर घटाया बढ़ाया तो हम जैसे छुटभइया-बहनों को जुकाम तो होना ही था। सो हम भी आ गये इसकी चपेट में ठीक वैसे ही जैसे एन सी पी, कांग्रेस और बी जे पी की चपेट में महाराष्ट्र.....खीखीखी...। अब महाराष्ट्र की जनता ने ये थोड़े सोचा था कि उनके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आधा धड़ किसी और पार्टी का और सिर किसी और पार्टी का बैठेगा। नागरिक ने तो यही सोचा कि भाई इंसान चुनो विकास की राह खुले, गरीब गुरबों को तसल्ली मिले, पर हुआ क्या? कुर्सी बंटवारे की ऐतिहासिक पहल कि ढाई साल तेरे और ढाई साल मेरे। 

तो खैर साहब इस सरसराती चली आ रही सर्दी और दिन की तपिश ने मुझे भी घेरा और जुकाम, बुखार, गला खराब जैसी 3 बीमारियों से मुझे पुरस्कृत किया। ऊपर वाले की ज़र्रा नवाज़ी है कि जिस तरह अरविंद केजरीवाल के पास कुमार विश्वास जी दूर रहकर भी पास रहते हैं उसी तरह जैसलमेर में बहुत सारे डॉक्टर, वैद्य, दादा-दादी के नुस्खे मेरी नासाज़ तबियत का बड़ा ख्याल रखते हैं। सो हमारे टिफिन वाले शंकर भैया ने कहा ‘‘मैडम जी मैं कढ़ी ले आता हूं आप पीयें और जुकाम तो सौ प्रतिशत दूर हो जायेगा। मैडम गोली दे देता हूं सुबह तक सब कुछ ख़तम आप एकदम अच्छी। मुझे तुरंत अपनी बेटी की याद आई कि अरे मुझे गोली ? मर गई तो मेरी औलाद का क्या होगा? शंकर भाई का अगला सवाल ‘‘मैडम कौन सी गोली खायेंगी?’’ मुझे पूरा समझ आ गया कि भई मरने वाले की आखिरी इच्छा पूछी जा रही है बंदे में इतनी गनीमत है कि ये पूछ रहा है कि....। ठीक वैसे ही जैसे मोदी जी चाइना से पूछते हैं कि भई सुधरता है या व्यापार बंद करूँ, तुर्की से कहते हैं आतंकवाद के खिलाफ समर्थन करता है कि दाना-पानी कम करूँ? मेरी हालत उन पाकिस्तानी नागरिकों की तरह कि वे करें तो क्या करें अब आखिर राजनेता हैं तो उन्ही के देश के-कौन सुने दिल की जुबां जायें तो जायें कहां.....और अब तो हद हो गई जब देखो तब एक नये बिल की, नागरिकता विधेयक की छुर्री और छोड़ देते हैं। अरे छुर्री मतलब फुलझड़ी कोई छूरी नहीं इतना भी न डरती मैं अमित शाह जी से। जी इसी लिये लगा रही हूं कि नेता नहीं लेखक हूं इस बात को सब नेता समझ जायेंगे तो मेरी जान बख्शी रहेगी।

दो पलों में मेरे पसीने छूट गये कि कौन सी गोली मिलनी थी भला बंदूक, पिस्टल, देसी कट्टा, अंग्रेजी दवा, आयुर्वेद, अल्कोहल सी हल्की महक वाली होमियोपैथिक या वो गोली जो ठेकेदारों द्वारा अफसरों नेताओं को और अफसरों द्वारा अपने सीनियर और पब्लिक दोनों को दी जाती है। एक गोली यानी संख्यात्मक आंकड़े नाम की गोली से जनता और ओहदेदारों की जुबान पर ताला लग जाया करता है। और ये ऐसी गोली है जो सदियों से ऐसे ही काम कर रही है। हम जुकाम के मौसम मे भी पसीने-पसीने हो गये और यकीन जानिये हमारा गला डबल बंद हो गया।

साहब हमने तुरंत गोली को न और कढ़ी को हां किया और साथ में ये भी जोड़ दिया कि भैया मैं देसी हूं और देसी इलाज पर पूरा भरोसा है तो आप कल भी कढ़ी पीला दीजियेगा। शंकर भैया भी खुश कि वाह मैडम तो कढ़ी में ही निपट लेगी गोली की जरूरत नहीं। 

दूसरे दिन की शुरूआत कुछ यूं रही कि शाम तक एक कप काफी के अलावा कुछ भी नसीब नहीं हुआ और भूख ने आतंक मचा दिया मानो आतंकवादी भारतीय सेना को सर्जिकल स्ट्राइक करने के लिए उकसा रहा हो। पाठकों भारतीय सेना के वीर जवानों की तरह मेरा भी मन किया कि भूख पर टूट पड़ो और वायुसेना, थल सेना की तरह एक लोटा जल सेनापति सहित कढ़ी, चावल रोटी सब कुछ गोला बारूद की तरह दे मारो ताकि चक्कर आना बंद हो और वैसी ही शांति हो कि पड़ोसी राजनेता बोल दे वहां कुछ था ही नहीं। फिर भले ही पब्लिक है सब जानती है.....

हुजूर सब्र का बांध टूटा तो शंकर भाई टिफिन वाले को याद दिलाया कि भैया रोज तो खाना आठ बजे से पहले आ जाता है और आज क्या बात घड़ी का कांटा आठ पांच से भी आगे निकल गया? उधर से जो जवाब आया उसने मेरा वही हश्र किया जो आजकल शिवसेना का है-मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं... जवाब था-ओहो मैडम भूल गया, कढ़ी लानी थी, खाना आपने तो मना किया था। अगर मेरे आस-पास कढ़ी का कटोरा होता तो डूबने में एक सेकंड न लगता। अरे भई इसी बहाने भूख तो मिटती। खैर उनसे तो कह दिया कि ठीक है मैं बाहर खा लेती हूँ। साहब बाहर निकलते ही एक लॉज ने खाना देने से इसलिये मना कर दिया की उनकी थाली 100 रूपये की और मैं 2 रोटी और एक कटोरी कढ़ी के उन्हें 40 रूपये ही दे के टरका देती थी। तो साहब दूसरे चंदनश्री रेस्टोरेंट की तरफ हमने मुँह उठाया और घुस के बैठ गये कि हम चाहे जैसे हों पर चंदनश्री के भाई लोग खाना गरम-गरम और बहुत प्रेम से खिलाते हैं। वहां जाकर शहंशाहे थाली का आदेश दे दिया और प्रतीक्षा करने के बहाने किचन की तरफ घूरने लगी कि मेरा खाना कितनी जल्दी आ जाये। साहब खाने की थाली सामने आते ही जो सब्ज़ियाँ मुझे समझ नहीं आईं तो शंका निवारण के लिए वेटर भाई से पूछ लिया वे बोले आलू-पालक मुझे सुनाई दिया काजू पालक मैंने कहा वाह किस्मत खुल गई आखिर, काजू दर्शन करने की लालसा में गौर से देखा तो सच्चाई समझ में आई और साहब थाली के बीच चमकती सुंदर सी पीली परी जैसी कढ़ी पर मेरी नज़र अटक गई। सारी सब्जियां वापस कर के कढ़ी मंगाई और सोचा संतोषं परं सुखम् कढ़ी पियम् घरे जावम्। 

हाय रे मेरी किस्मत! पूछिये न साथियों बस मुंह से आह और सांसों से उच्छवाह निकलती है-पीली परी सी सुंदर कढ़ी मैडम अकेले नहीं आई थीं नमक का हैंडसम समंदर साथ में लाई थीं। समंदर भी ऐसा जो जीभ पर जा-जाकर हिलोरें मार रहा था। अब न खाती तो पैसे बर्बाद और खाती तो?? आप सब खुद ही समझदार हैं क्या-क्या बर्बाद हो सकता है। हमममम...चलते-चलते एक कहावत याद आ रही है कि गुड़ डाला हंसिया न निगला जाय न उगला जाये। अब जरा इसको कढ़ी पर फिट करें तो नमक से भरी कढ़ी....


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