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Amit Kumar

Others

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Amit Kumar

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इंसानियत

इंसानियत

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तोड़ सको तो

तोड़ दो

इंसानियत का दिल

मरोड़ दो

उन संतृप्त भावनाओं को

जो मानवीय जीवन मूल्यों की

स्थापना का आधार है


खोल दो उन

बन्द खिड़कियों को

जिन्होंने इस वहशी

और भयावह तूफान को

किसी तरह भीतर आने से

रोक रखा है

बचा रखा है

इन्ही दीवारों की ओट ने

इंसानियत को लहूलुहान होने से


मगर अब क्या?

हो जाने दो बर्बाद

इस आधार को

जो मानवता की एकमात्र

मशाल बनकर हम इंसानों में

अपनी प्रेम लौ के अलौकिक

प्रकाश को हमारे भीतर

उड़ेलता रहा है...


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