और बचपन बेघर हो गया
और बचपन बेघर हो गया
इस हाईवे से गुजरते हुए
अक्सर एक फटेहाल बालक को
शाम के वक़्त यहां खड़ा पाता था
आज भी रोजाना की तरह,
अबोध चेहरे पर नज़र पड़ी
बहुत दिनों से इक कौतूहल था मन में कि
इस रहस्य को जानूं, कार से उतरकर
उसके करीब गया, वह अब भी वहाँ खड़ा
गगन चुम्बी मीनार को टकटकी लगाए
देख रहा था, मेरी जिज्ञासा बढ़ती गयी
चुप्पी को तोड़कर, मैंने पूछ ही लिया कि
तुम हर शाम यहाँ खड़े होकर
इस ऊंची मीनार को क्यों देखते हो
क्या सम्बन्ध है तुम्हारा इससे
नादाँ के आँखों से आंसूं टपक पड़े
भरे हुए दिल से बोला, जहाँ ये मीनार खड़ी है आज
वहाँ कभी हमारी बस्ती हुआ करती थी
सामने मैदान था, जहाँ हर शाम
अपने दोस्तों के साथ खेला करता था
लेकिन एक दिन, रात का वक़्त था
कुछ लोग हाथों में डंडे लेकर आये और
रातों रात बस्ती खाली करा दी
पल भर में हमारी बस्ती जैसे बेघर हो गयी
सुनकर दर्द भरी व्यथा, मैं अपने आंसू रोक न पाया,
दिल भर आया था, तक़दीर ने वक़्त से पहले
इसका बचपन छीन लिया, क्या कुसूर था बेगुनाहों का
किसी के गुनाहों की सजा इनके हिस्से क्यों आयी
शाम ढल चुकी थी, पंछी भी घर को लौट रहे थे
अँधेरे में वह मासूम जाने कहाँ ओझल हो गया
