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Savita Gupta

Others

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Savita Gupta

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आज हरी हूँ...

आज हरी हूँ...

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आज हरी हूँ मैं 

शान से खड़ी हूँ मैं 

हरे तन के चुनर 

लहराते पवन झकोर

बाँहें फैलाए दे रही मैं 

छाया शीतल घनघोर 

रसीले लदे फल देती 

शुद्ध वायु फैलाती चहुँ ओर! 


सावन में कजरी गाए गोरी

झूला बाँधे ,बाँहों में डोरी

पींग मारे हर्षित नारी।

हरी चूड़ियों की खन खन

झूमूँ मैं भी मगन सन सन।


बोले कोयलिया ,कुहू कुहू मतवाली

फुदके गिलहरी डाली डाली।

नाचे मोर मगन ,सब बजाए ताली 

सहम गई जब देख ,कटी बग़ल की डाली 

 

एक दिन

बारी मेरी भी आएगी

कुल्हाड़ी तन पर चलेगी

आज हरी हूँ मैं 

कल पीली हो जाऊँगी मैं।



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