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 सपने
सपने
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© Mukesh Nirula

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जब मैं इक छोटा बच्चा था, कुछ सपने देखा करता था 

सपने में मुझको दिखती थी, मेरी अम्मा मेरी दादी 

 

जितने भी सपने देखे थे, उन में थी मुझको आज़ादी 

सपने में देखा करता था, अपने संगी अपने साथी 

 

मुझको सपने में दिखते थे, खेल खिलौने मेरे साथी 

कभी कभी जीता करता था, हार कभी मुझको मिल जाती 

 

सपने में मुझको दिखते थे, मेरे अपने कुछ सहपाठी 

नयी मंज़िल की बातें करते थे, मंज़िल पर ना पास थी आती 

 

जीवन के इस मोड़ पे अब, मुझको नींद नहीं आती 

सपने में देखा करता हूँ, अपने पोते अपने नाती 

 

सपने देख देख कर सबकी, उम्र यूं ही गुज़र है जाती 

कभी तो मंज़िल मिल जाती है, कभी निराशा हाथ है आती 

 

सपने उम्र मंज़िल आज़ादी

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