Sarita Maurya

Others


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गधा मजदूर

गधा मजदूर

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हम इंसानों के समाज में ये कहा जाता है कि भई गधे से बहुत ज्यादा काम लिया जाता है और धोबी, कुम्हार, ईंट ढोने वाले तथा जाने कितने और लोगों के लिए गधा सबसे फायदे का जानवर रहा है। लेकिन मुझे बचपन से लेकर आज तक एक भी शख्स ऐसा नहीं मिला जिसने किसी के लिए ये कहा हो कि भई सामने वाला बड़ा मेहनती है बिल्कुल गधे की तरह काम करता है। हां ये जरूर सुनने को मिला अकल तो है नहीं गधे जो ठहरे! या फिर गधा समझा है क्या या फिर गधे की तरह दुलत्ती मत चलाओ काम करो गधों जैसी बातें मत करो वगैरा-वगैरा। और पिताओं, चाचाओं बड़े भाइयों के श्रीमुख से ‘‘गधा कहीं का’’ बड़ी सामान्य बात मानी जाती है। काश जानवरों की बोली समझ आती तो हम जान पाते कि गधों के कुटुंबी जन भी तो नहीं बोलते हैं--‘आदमी कहीं का’...

बेचारा एक सीधा-साधा छोटा सा पालतू जानवर जिसने न जाने इंसान की ज्यादतियों के साथ ही न जाने कितनी व्यंग्य भरी बातों को भी झेला है और झेलता चला आ रहा है। वो दिन कब आयेगा जब बोलकर कोई गधा इंसानों की बातों का जवाब दे सकेगा। तो शायद वो यही कहेगा इंसान समझ रखा है क्या कि मुंह से कुछ और व्यवहार से कुछ और! उसपर जब देखो तब उलटे-सीधे विशेषण और मिल जाते है।

अब आप पाठकगण यही सोचेंगे कि भई कहीं किसी गधे ने हमें दुलत्ती-उलत्ती तो नहीं मार दी कि हम चोट खाकर आंयबांय बकने लगे और मारे डर के गधों की वकालत किये जा रहे हैं। अरे नहीं ऐसा नहीं है। हम तो शुरूआत से ही गधा परस्त रहे हैं बस कभी मौका नही नसीब लगा कि सही मंच से गधों की पैरवी कर सकें। तो आप कहेंगे अब आप कौन सी बुकर विजेता बन गई हैं कि आप जो गधों की पैरवी करेंगी तो उसे जग प्रसिद्धि मिल जायेगी। बस साहब मान के चलें कि नकारा घर बैठो तो खुराफात सूझ ही जाती है तो बस हमें लगा कि हमारे और उनके स्तर में यदि शारीरिक संरचना और अकल के गुमान ‘‘हालांकि अकल वाला मसला थोड़ा संशय का ही है कहीं हम उनके बोल नहीं पाने और अभिव्यक्ति नहीं करपाने का फायदा उठाकर स्वयं को ज्यादा अकलवाला घोषित कर देते हों’’ को छोड़ दिया जाय तो भी किंचित बहुत समानता है। हमें लगता है हमारी अकल बड़ी है पर यदि देखा जाय तो बड़ी तो उसी की होती है। और विश्वास नहीं हो तो किसी दिन इंसान और गधे दोनों की अकल को तोल कर देख लें आप लोग। अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए इंसान अकल तोलने का भी जुगाड़ कर सकता है और यह काम सिर्फ आदमी ही कर सकता है इस बात का मुझे पूर्ण विश्वास है। क्या करूँ भाई इंसान की नस तो इंसान की नस-नस से वाकिफ होती ही है न!

खैर! गधों के प्रति मेरी संवेदनशीलता का एक कारण उनके और हम जैसे निम्नमध्यमवर्गीय परिवारों के कमाउ पूतों की स्थिति का एकसा होना भी रहा है। उदाहरण के लिए चाहे घर का बड़ा सदस्य हो तो भी घर का छोटा सदस्य हो तो भी उसके लिए कुछ विशेष स्तरीय वाक्य होते हैं जैसे ‘तुम तो कमाते हो’, ‘कमाने का रोब है’, ‘तुम नहीं करोगे तो कौन करेगा’ इसे अलग कर दो कमाने के कारण इसके नखरे बढ़ गये हैं वगैरा-वगैरा। अब भई गधे पर तो धोबी आते भी कपड़े और रेहू की गठरी लादते हैं और जाते तो गीले कपड़ों की लदान होती ही है। कुम्हार बर्तन लाद देते हैं तो राजस्थान के लोग पानी, ईंट जो भी मिले सब लाद देते हैं। घुमक्कड़ जोगी जाति गधा गाड़ी खिंचवाते हैं सो अलग। मुल्ला नसरूद्दीन जैसे तमाम लोग बिचारे की पीठ पर बैठ कर उसे तोड़ने का काम बखूबी निभाते हैं।

साहब इसी को जरा किसी प्रतिष्ठान में काम करने वाले उस कर्मचारी की पायदान पर बैठ कर सोचें जिसका स्तर बड़ों से छोटा लेकिन छोटों से बड़ा है और दोनों ही तरफ से दायित्व की गठरी लदी हुई है। यानी मझोला कर्मचारी है। छोटों को डांटेगा तो काम कैसे लेगा और बड़ों को डांटेगा तो काम कैसे करेगा? क्या हुआ आपको तो पसीना आने लगा और आप मुस्कुरा रहे हैं लेकिन आंखें भीगी हुई हैं। अरे!बस बस, इन स्थितियों से हम भी गुजर चुके हैं आइये आप मेरी जानें और अपनी मुझे बतायें-

तो पाठकों इस बेकारी के जमाने में लिखने से पूर्व हम भी किसी प्रतिष्ठान में बीच के मुलाजिम थे। जब कार्यालय में पहली बार प्रवेश किया तो मन ख़ुशियों से हिन्दी में ओत-प्रोत और उर्दू में लबरेज़ था क्योंकि इतनी प्रतिष्ठित जगह पर उच्च पद जो मिला था। लेकिन नये प्रवेशार्थी के आने पर जो मुस्कुराहटपूर्ण स्वागत का सपना पाले हुए बड़े से गेट के छोटे से दरवाज़े में प्रवेश किया तो वो सपना धम्म से गिर पड़ा और हम मुह बाये घंटों भटकते सिर्फ या पूछते रह गये कि हमें अपनी शुरूआत कहां से करनी है हमारे लिए कार्यालय का कौन सा कोना है जहां हम अपना डेरा जमा सकें। 

साथियों उसके बाद जब साथी कार्यकर्ताओं की बारी आती तो सीधे मुंह तो कुत्ता भी नहीं चाटता फिर वे हमसे सहयोग कैसे करते। फिर दूसरे दिन की बैठक में कर्मचारी साथियों द्वारा असभ्य भाषण का मुकदमा और दर्ज हो गया क्योंकि किसी अंटीबेन को हमने अंटीजी कह डाला और हमें पता ही नहीं था कि भाई गुजरात में पति पत्नी भी एक दूसरे को भाई-बेन कहकर बुलाते हैं। तो साहब इस दंड के एवज में हमने काम के दूसरे दिन ही सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांग कर अपनी निरीहता दर्ज कर दी और काम का श्री गणेश किया। अब साहब सप्ताह भर कभी हम इधर बिठा दिये जाते तो कभी उधर बिठा दिये जाते, कभी मुंह उठाये इस बैठक में बिठा दिये जाते तो कभी उस बैठक में हां बोलने की खतरनाक मनाही थी। 

कहने को पूरे राज्य के मालिक बना दिये गये थे लेकिन निर्णय लेने की तो बात दूर यदि एक छोटा सा पेन भी चाहिये होता तो एक घंटे तक एकांउंटेंट, वजीरे आला से लेकर एडमिंनस्ट्रेटिव प्रबंधन के तलवे रगड़ने के बाद मिल पाता तो ठीक वरना बिना मार्कर ही प्रशिक्षण सम्पन्न हो जाता। और काम? अरे साब प्रोफाइल में लिखे काम के अलावा सारे काम करने की इजाज़त थी -जैसे लोगों की चुगलखोरी करना, सुनना, आदाब बजा लाना, कार्यकर्ताओं ने जो उलटीसीधी शिकायतें की हों उनके एवज में डांट खाना, कोई निर्णय नही ले पाना आदि-आदि। हमारे तो पैरों तले जमीन ही खिसक गई जब हमें ये सुनने को मिला कि काम धाम तो कुछ आता नही था लेकिन हम तो वज़ीरे आला की कुरसी पर नज़र जमाये बैठे थे इसी वजह से वजीरे आला हमसे सीधे बात नहीं करके हमारी शिकायत अपने वजीरे आला से करके हमें समझाने की फिराक में थे। साहब हमने बिना समझे बूझे अपनी अकल लगा दी और अपने वजीरे आला से और कह बैठे कि ‘‘हमारे बीच जो वार्तालाप ’’ नहीं हो पा रहा है तो क्यों न इसको समझकर सुधार लिया जाय। बीच का वार्तालाप तो न सुधरा लेकिन हम बिना बिगाड़ के सुधार दिये गये। क्योंकि साहब शिकायत भी हुई और एक तरफा अंग्रेजी हुक़ूमत की याद भी आई जहां सिर्फ फैसले सुनाये जाते थे किसी की नज़ीर तकरीर सुनी नहीं जाती थी। 

पता नहीं क्यूँ एक उम्मीद सी थी कि सब जगह से निराश हताश यदि बुजुर्गों के पास पहुंच जाय तो उसको कुछ न कुछ आशीर्वाद मिल ही जाता है सो हम कार्यालय के संस्थापक, प्रतिष्ठापक या यूं कहें कि निर्माता के पास जा पहुंचे अपना दुखड़ा लेकर कि कम से कम फाँसी पर चढ़ाने से पूर्व झूठा ही सही पर अपराध तो अंग्रेज भी बताते ही थे सो हमारे व्यवहार में या काम में कहां समस्या थी ताकि हम उसे सुधार सकते, तो साथियां वहां पता चला कि दिक्कत नहीं होना किंचित सबसे बड़ी दिक्कत थी और वे स्वयं इस सबसे दुखी तो थे किन्तु हलविहीन थे। अर्थात सिर्फ बैल थे जिसने अपने सींग होने व उनकी शक्ति की पहचान को खोते हुए अपने आपको खूसट लट्ठबाज किसान के हाथों में सौंप दिया था। और वो किसान इतना पशुवत हो गया था कि आज उन्हीं के बनाये महल के बंटवारे की बात कर उनके ह्रदय को छलनी किये जा रहा था। और वो हाथ मल -मल के सोच रहे थे कि हल कहां है हल कहां है?

खैर साहब हमारी समझ इसी में थी कि हम थोड़े में ही समझ जाते सो हम समझ गये और नतीजतन बिना कुसूर सत्ताइस दिन की मजदूरी कटवाकर अपनी राह नाप लिये। घर आये तो वही ताने वही बातें हमारे इंतज़ार में थीं अब बेटी कैसे पलेगी? घर कैसे चलेगा? आगे क्या करना है? नौकरी कोई लड्डू नहीं है जब चाहा खाया जब चाहा रख दिया, पक्का कोई गलती की होगी? अरे हर जगह बोलना जरूरी नहीं, आंखों देखी मक्खी निगलनी पड़ती है वगैरह! और हम सोच रहे थे कि गलती कहां की भाई? इस सबके बीच आपको एक बात बताना याद नहीं रहा। जब हम वहां से अपना बोरिया बिस्तर पीठ पर बांध कर सामान के साथ निकल रहे थे तो हमें स्टेशन छोड़ने आये ड्राइवर ने ये आइडिया मुफ्त में पकड़ाया और बोला कि सरिताबेन वैसे तो आप मैडमसाब हैं फिर भी आपको एक बात कहूॅंगा कि ‘‘हम सब यहां पर इसलिये टिके हैं कि हम सब गांधीजी के तीनों बंदरों की तरह अपने आँख, मुँह, कान बंद रखते हैं और कभी-कभी तो नाक भी ताकि गलती से ताजी हवा नहीं घुस जाये, तब जाकर इतने सालों से टिके हुए हैं, पब्लिक की खाते हैं साहब की गाते हैं वरना आपको बताऊं कि हमारे घरों में चूल्हा नहीं जल पायेगा।" यकीन जानिये मुझे पहली बार गांधी जी की तीनों बातों की व्याख्या व सार्थकता के नये अर्थ सच्चे मायनों में दुनियादारी के बहुत ही करीब लगे और लगा कि आज के परिवेश में तो क्या बापू के इन शब्दों में तो सदियों के लिए जादू है। दूसरी बात अगर आप क्षेत्र में जाकर संगठन, समुदाय और संस्था की भलाई का काम करेंगे तो नहीं चलेगा। हां अगर आपने किसी दूसरे के धरने रैली में शामिल होकर फोटो उतार कर उसे अपना बता दिया या किसी अन्य के कार्यकर्ताओं को तोड़ लिया, व्यक्ति की बेइज्जती करदी तो चलेगा और यही नहीं झूठे दस्तावेजीकरण के बल पर आप हजारों के बिल पास करवा सकते हैं माल डकार सकते हैं। यकीन जानिये साथियों मेरा मुंह गधे की माफिक ही खुला का खुला रह गया। मारे दुख व जलालत के यदि ढेंचू निकल जाता तो मेरी इंसानियत तर जाती लेकिन ऐसा हो नही पाया। जहां वहां के तमाम अच्छे साथियों का साथ छूटने का दुख था तो जेल से छुटकारा पा जाने की खुशी भी थी। लेकिन मन में एक डर भी था कि क्या गारंटी है कि वापस किसी दूसरे कार्यालय में ये सारी व्यवहारिक बातें नहीं मिलेंगी। और मेरा मन सोच बैठा कि सच ‘‘हम से अच्छे तो गधे हैं जो दिन भर की मेहनत के बाद थक कर जब एक जगह इकट्ठे होते हैं तो अपने दुख व खुशी दोनों में रेंक तो सकते हैं।" और हम? सवाल काफी बड़ा है साथियों! अरे! गलत कह दिया क्या? खैर मायने अपने-अपने अब हम तो चले। और नई नौकरी भी तो ढूंढनी है भई...... तो लेलो-लेलो कोई गधा मज़दूर ले लो.....


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