Harish Bhatt

Others


3.6  

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दहलीज

दहलीज

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-महिला समानता दिवस पर विशेष -

क्या कभी किसी ने सोचा है कि महिलाओं को आरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ी? आज हर क्षेत्र में महिलाओं की दखलंदाजी क्यों बढ़ रही है? शारीरिक व मानसिक रूप से पुरुष से कमजोर नारी आज सशक्त होकर घर की दहलीज क्यों लांघ रही है? इन सवालों का सिर्फ और सिर्फ एक ही जवाब हो सकता है कि जब से पुरुषों ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना शुरू किया, तो उन जिम्मेदारियों को पूरा करने की जिम्मेदारी महिलाओं ने स्वयं अपने कंधों पर ले ली। अब जब जिम्मेदारियां पूरी करने का सवाल हो, तो घर से बाहर निकलना ही होगा। सुबह घर से निकलते हुए रामू की मां ने कहा कि रामू के पापा, शाम को आते समय दूध लेकर आना, क्योंकि आज सुबह दूध वाला दूध देने नहीं आया था। उस समय तो रामू के पापा ने कहा ठीक है, लेता आऊंगा। लेकिन शाम ढलते-ढलते जब लड़खड़ाते हुए रामू के पापा खाली हाथ घर में घुसे तो अगले दिन से रामू की मां को दूध लेने के लिए स्वयं ही जाना पड़ा। अब अगर रामू के पापा दूध लेकर आ जाते तो रामू की मां को घर से निकलने की क्या जरूरत पड़ती। अब खेतों में फसल लहला रही है, उसकी कटाई भी करनी है, लेकिन रामदीन के पापा को गांव की चौपाल पर नेतागिरी करने या महफ़िल लगाने से फुर्सत नहीं है तो खेतों की देखभाल कौन करेगा। फिर बच्चों को भी खाना देना है ऐसे में बच्चों को खाना देकर या फिर छोटे बच्चे को पीठ पर लाद कर खेत पर जाने के सिवाय रामदीन की मां और कर भी क्या सकती है। फिर कहा भी तो जाता है कि मजबूरी ही सब कुछ करवाती है। ऐसे में अगर अपना व अपने बच्चों का पेट भरना हो तो घर से बाहर तो निकलना ही होगा। अगर पुरुष अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभा लेते तो क्या जरूरत थी, एक महिला को खेतों व सड़कों पर जाने की। वैसे भी तो घर में सुबह से रात तक उसके पास इतने काम होते है कि वह भी ठीक से पूरे नहीं हो पाते। उस पर घर खर्च के लिए रुपए-पैसे का इंतज़ाम करने की दोहरी मार। बस ऐसे ही धीरे-धीरे इसी मजबूरी चलते आज महिलाओं ने अपना हक मज़बूती के साथ मांगना शुरू कर दिया। अगर पुरुषों ने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाया होता तो आज न तो मंहगाई बढ़ती और न ही घर की महिलाओं को आरक्षण की जरूरत पड़ती। बात यह है कि अगर पुरुष अपनी जिम्मेदारियों के प्रति ईमानदार हो जाए तो किसी भी महिला को किसी भी तरह के आरक्षण की आवश्यकता नहीं होगी।


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