तहखाना
तहखाना
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हर औरत अपने दिल में
एक तहखाना बना कर रखती है
जहाँ वो अपने मायके की
हर याद छुपा कर रखती है
वो यादें ही होती है जो उसे
जीने का मकसद देती है
ससुराल के तपते रेगिस्तान में
वो यादें ही बौछार सी भिगोती है
कैसे बचपन बीता कैसे हुई स्यानी
माँ बाबा के लिए थी मैं उनकी रानी
बहन भाई ने भी कितने नाज़ उठाये थे
कितने ही अनमोल पल साथ बिताए थे
तन से आज भले दूर हूँ सबसे
पर मन से अब भी साथ हूँ सबके
जब जब पीहर की याद सताती है
हर औरत उस तहखाने घूम आती है
कुछ पल जी कर उन यादों में
फिर घर गृहस्थी मे जुट जाती है
