तहखाना
तहखाना
1 min
226
हर औरत अपने दिल में
एक तहखाना बना कर रखती है
जहाँ वो अपने मायके की
हर याद छुपा कर रखती है
वो यादें ही होती है जो उसे
जीने का मकसद देती है
ससुराल के तपते रेगिस्तान में
वो यादें ही बौछार सी भिगोती है
कैसे बचपन बीता कैसे हुई स्यानी
माँ बाबा के लिए थी मैं उनकी रानी
बहन भाई ने भी कितने नाज़ उठाये थे
कितने ही अनमोल पल साथ बिताए थे
तन से आज भले दूर हूँ सबसे
पर मन से अब भी साथ हूँ सबके
जब जब पीहर की याद सताती है
हर औरत उस तहखाने घूम आती है
कुछ पल जी कर उन यादों में
फिर घर गृहस्थी मे जुट जाती है
