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समझ

समझ

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ये पेड़ों की मिट्टी, बदलने की जिद सी,

ये गर्मी के मौसम को, सर्दी सा कहना।


समन्दर के गहरे में, पानी वही है,

इसे खारा कहना, उसे मीठा कहना।


जुबां सबके मुंह में है, फिर भी अचानक,

नमक मीठा लगना, शहद खारा लगना।


अरे यारों छोडो, ये दूकानदारी,

यह बाजार है, हर शै बिकाऊ नही है।


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