शिशिर
शिशिर
आई ऋतु है शिशिर, हर वर्ष आती फिर,
दिखे शीत का कहर, काँपे सभी थर थर।
गिरे द्रुमों के पल्लव, नग्न लगे मानो शव,
छिपा उर में जीवन, झेलें वायु तन पर।
नगों पर है तुषार, भूतल है बना क्षार,
अति शीत में गलन, लगे तन मानो शर।
संचित ताकत की है, अंतस में बाँध ली है,
जब आएगा वसंत, खिलेंगे वे शक्तिधर॥१॥
जितना भी कष्ट देती, शरीर को पुष्टि देती,
नवशक्ति धारकर, भोगता बसंत तन।
शिशिर में योग देखो, साधना भी नित सीखो,
वस्त्र त्याग खड़े द्रुम, अर्जन को तप धन,
नर वस्त्र बहु धारे, लगते हैं ऋक्ष सारे,
अविचल हुआ तन, चंचल है हुआ मन।
उर है उल्लास उगी, सुखद की आस जगी,
शिशिर कंटक मध्य, वसंत है कली बन॥२॥
