नहीं आता
नहीं आता
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न कर गुलज़ार दिल इतना कि अशक आँख में ठहरें
ज़ैर ऐ ग़म को हर राह से उतरना नहीं आता
उस शाख़ को भी हक़ है फ़िज़ाओं मे बहकने का
जिस शाख़ के फूलों को सवरना नहीं आता
ख़ुऐ सवाल से सिऱफ़ होती नहीं आमद कज़ा की
ज़िन्दगी तुझको इम़तेहां लेना नहीं आता
गुलों पे उतरती है गज़ल रात भर अर्श से
जावेद तुमको ही शबज़ाद होना नहीं आता
