मुझे समझना आसान नहीं
मुझे समझना आसान नहीं
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मुझे समझना आसान नहीं
क्योंकि कभी शब्दों के गूढ़ अर्थों
में छिपी एक कहानी सी
हूँ मैं…….
तो कभी वृक्षों की टहनियों में
कलरव करते पक्षियों की
चहचहाती हुई अजनबी सी
ध्वनियों सी हूं मैं
कभी नव-यौवन सी बालिका
की मधुर मुस्कान में छपी
उसकी अल्हड़ प्रेम कहानी सी हूँ
तो कभी प्रेम में लिखी गई
उन कहानियों की नायिका सी
हूँ तो कभी उनके गमों में छिपी
उनकी विरह वेदना सी हूं मैं
मुझे नहीं पता क्या हूं मैं?
मैं तो खुली किताब के उन
पन्नों की गहराइयों सी हूँ
जिसे समझना आसान नहीं!
