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usha yadav

Others

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रोज ही टूटती हूँ

रोज ही टूटती हूँ

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रोज ही टुटती हूं फिर रोज ही 

अपने को बनाती हूँ

 

जैसे शब्दों का टूटना अपने

आप में बिखर जाना है होता है 

वैसे ही रोज-रोज टूटकर 

 स्वयं को ही मैं बनाती हूं 


 हवा हूं इसलिए उड़ी चली जा रही हूँ

 यह भी पता है मुझे कि मंजिल पर ही

 है अब मुझे ठहरना

 

पल भर का यह जिंदगी का सफर 

कभी मजबूरियां बनकर तो कभी गम की

हंसी बनकर सिखा जाती है हमें रोज

 टूटकर फिर से बनना

 

बिखरना अब मुझे अखरता नहीं 

क्योंकि सीख चुकी हूं अब मैं भी 

इस जिंदगी को परखना।



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