STORYMIRROR

Paramita Sarangi

Others

3  

Paramita Sarangi

Others

मंत्र

मंत्र

1 min
168


कुछ लिखना ‌चाहती थी 

तुम्हारा ही अंश हूं

एक नई कविता 

माँग रही थी खुद को

चेतना के अंधकार में

ढूँढते हुए पहुंच गई थी

एक अनजान बस्ती में

जहाँ फैली हुई थी

मुट्ठी भर निःशब्धता


स्वर्णमृग जैसे सारे शब्द

भाग रहे थे संज्ञा शून्य होकर

मैं थी उनके पीछे,

क्षत-विक्षत स्वीकृति को लेकर


कुछ मधुर ध्वनि की खोज

बसन्त दूत की शुक्ष्म गुंजन

के साथ,

पुलक नई रचना की


पकड़कर सारे शब्दों को

ले आई तुम्हारे पास

बदल गए वे सारे शब्द

मंत्र में

शायद तुम्हारे छूने के बाद।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन