मैं किसान हूँ
मैं किसान हूँ
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है कृषि मनु सभ्यता का स्तंभ आदि
और मैं प्राणानिवार्य का प्रदाता।
क्यों ना मुझको ईश समझे मनुज जाति
हो ऋणी, मैं हूँ जगत का अन्नदाता ।।
सींचता श्रम जल से मैं ऊसर मही जब
दिनमणि सा कार्यरत रहता निरंतर।
प्रस्फुटित होता नव अंकुर रिद्धि का तब
चीरकर आता सहज वसुधा का अंतर ।।
किन्तु छाया प्रहार प्रकृति का कभी
और कदा आघात अधिपति का सहा।
भोगी मैंने विघ्न, विपदाएँ सभी
पथ परीक्षा से भरा प्रति क्षण रहा।।
निज मूल्य से अनभिज्ञ हूँ, मैं आज भी
खोजता पहचान और सम्मान हूँ।
चिर उपेक्षित पंक्ति समाज की, आज भी
अधिकार वंचित हूँ खड़ा," मैं किसान हूँ "।
