STORYMIRROR

मासूम सा था नादान सा था....

मासूम सा था नादान सा था....

1 min
692


मासूम सा था नादान सा था

वो इश्क हैरान परेशान सा था

चेहरे पर लटकती थी जो जुल्फें

लगता उससे वो बेईमान सा था

वो जो कच्ची उमर का इश्क था

लगता वो सच्चा इमान सा था

खिलखिलाती हँसी जो थी उसकी

उसी मे बसता मेरा सारा जहाँ सा था


बेवरपाह सा था वो जमाने से ऐसे

जैसे हर चीज से वो अंजान सा था

आया वो जिंदगी मे ख़ुशियाँ लेकर लेकिन

कुछ पल ठहरने वाला मेहमान सा था

जाने वाले लौटकर आते नही कभी

फिर भी मुझे उस पर गुमान सा था

मिल जाए अब मुझे कुछ भी लेकिन

तेरा आना न मिटने वाला इक एहसान सा था.....


Rate this content
Log in