STORYMIRROR

मानवता की वलि

मानवता की वलि

1 min
790



मानवता के खून से,

संहार ही संहार

फैला है

चहुँ दिश ,

आतंक के साये

में

हम सब जी रहे हैं !!


बच्चे अपना

आज बचपन

खो रहे हैं ,

क़त्ल का है

जश्न

खूनी ....असुर बनते जा रहे हैं !!


भाग्य भी

है बाम

विपदा बढ़ रही है, दुर्घटनायें भी

शिकंजा

कस रही है !!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन