लोग
लोग
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लोग धरने देते है
वो नहीं सुधरने वाले
वो जानते है
मज़हब के मायने
समझते है मतलब की ज़बान
लरज़ते होंठों पर
उन्होंने
मौत का स्वाद
रख छोड़ा है
जिस सम्बन्ध में
फायदा है
कायदा जाए
भाड़ झौंकने
बस वहीं स्वार्थ का
एक रिश्ता अंत में
जोड़ा है
अन्याय को लाचारी
और साम्प्रदायिक भावना से
ओतप्रोत कर
देश के हित से
अपने हित को
ज़रा मोड़ा है
नाम देश के
बोलो ज़ोर लगाकर
ख़ामोशी से कर लो
अपनी हसरतों की
दुनियाँ मुट्ठी में
मूर्ख है या
मूर्ख बना रहे है
लोग
जानबूझकर क्यों
अपनी बर्बादी के
लावे को भड़का रहे है
लोग...
