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Priya Kulkarni

Abstract

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Priya Kulkarni

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कविता

कविता

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पूछते हैं नाराज़ किस से हो,

सोचता हूँ आगाज़ किस से हो।


दिल के पन्ने खोलना नहीं,

ग़म किसी से बोलना नहीं।


राज़ ग़र हो दफ़न ही सही,

मुर्दे को तो कफ़न ही सही।


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