जलता शहर
जलता शहर
चंद सिक्कों की खातिर
बेच देते हैं ईमान,
क्या हो गया तेरी
रचना को ए भगवान?
नफरत, बदगुमानियों से
जलता है तो जल जाए,
उनकी राजनैतिक रोटियों की
आंच कभी न कम हो पाए।
धुआं, धुआं है शहर
बस्ती ये वीरानी है।
सिसकती मानवता, क्यों
कम, आंख का पानी है?
बचेगा, वो भी नहीं
जिसने, ये आग लगाई है,
झुलसेगा घर उसका भी
जो इसका आशनाई है।
मेरे मौला, कर, कुछ करम
ऐसा कि सोई मानवता जग जाए,
किसी बेकसूर की थाली से
रोटी कभी न जाये,
जो गुनहगार हैं, बस
वो ही इसकी सज़ा पाएं।
गेहूं के साथ घुन पिसने
कभी तो बन्द हो भी जाएं।
