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Reetu Devi

Others

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Reetu Devi

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हूं तन से दिव्यांग मन से नहीं

हूं तन से दिव्यांग मन से नहीं

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हूं तन से दिव्यांग मन से नहीं,

हूं आशक्त दूसरों पर निर्जन वन नहीं।

कर सकती हूंं मंगल ही मंगल सकल जहां में

भर सकती हूंं  रंग ही रंग जीवन तन्हा में 

न समझ जमाना बेकार कभी मुझे,

मत अवहेलना कर पल पल नजरों में मुझे। 

हूं मैं भी राष्ट्र प्रगति पथ केे जलतेे दीये ,

हूं मैं भी अरमानों के तरू ,

रखूं हरे-भरे सभी बगिया।

पूर्ण कर सकती हूं मैं भी

सभी सुुुुुुनहरे सपने,

रख सकती हूंं  बंधनों में रिश्तों को 

मधुर संबंधों सेे अपने ।

महका सकती हूं भीनी भीनी

खुशबू से धरा,

कर सकती हूं परास्त दुश्मनों को

सभी बाधाओं को हरा ।

        


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